नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को कौन नहीं जानता ये हमारे देश के ऐसे वीर सपूत हैं जिन्होंने इंकलाब जिंदाबाद की आवाज बुलंद करते हुए देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन तीनों को लाहौर षडयंत्र के लिए फांसी की सजा सुना गई थी। इन सबने मिलकर लाला लाजपत राय की मौत के बदला लेने के लिए अंग्रेजी शासक जॉने सैंडर्स की हत्या कर दी थी। इन तीनों वीर जवानों में से एक राजगुरु की हम 115वीं जयंती मना रहे हैं। 23 मार्च 1931 में उन्हें फांसी हुई थी। इस दिन को हम शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं।
राजगुरु वाड़ा के नाम से जाना जाता है पैतृक गांव
राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के खेद गांव में हुआ था। वो लोकमान्य तिलक की विचारधारा पर विश्वास करते थे। घटप्रभा में ट्रेनिंग कैंप को जॉइन कर वो सेवा दल से जुड़े। इसके बाद वो हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य बने। इसके बाद वो भगत सिंह और सुखदेव के संपर्क में आए। राजगुरु के जन्मस्थान को उनके बाद राजगुरुनगर के नाम से जाना जाने लगा। उनके पैतृक गांव को राजगुरु वाड़ा कहा जाने लगा।
फांसी के समय केवल 22 साल के थे राजगुरू
राजगुरु ने एक ही गोली में जॉन सैन्डर्स को मार गिराया था। लेकिन उन्हें गोली मारने के बाद राजगुरु उदास हो गए थे। भगवान दास ने उन्हें उदास देखा तो इसकी वजह जानना चाही। राजगुरु ने इसका जवाब दिया कि ‘अगर तुम मेरी जगह होते तो तुम भी परेशान होते। हमारा पीछा करने वाला पुलिसकर्मी बेकार में ही मारा गया। उसका परिवार बहुत दुखी है और उसके बच्चे अनाथ हो गए हैं। तब उन्हें समझाया गया कि वो तो अपनी ड्यूटी कर रहे थे इसमें बुरा लगने की कोई बात नहीं है। राजगुरु गांधी जी की अहिंसा की नीति पर विश्वास नहीं रखते थे।
मां से बहुत प्यार करते थे राजगुरु
वो मिलेटेंट नेशनललिज्म में विश्वास करते थे। अपनी शाहदत के समय राजगुरु केवल 22 साल के थे। वह अपनी मां से बहुत प्यार करते थे। वो बचपन से ही साहसी, मस्तमौला और वीर थे। वह वीर शिवाजी के बहुत बड़े भक्त थे। उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता था।
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