back to top
24.1 C
New Delhi
Sunday, March 29, 2026
spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

स्कूल बनें खेलों की नर्सरी : अशोक ध्यानचंद

भोपाल, 15 अगस्त (आईएएनएस)। भारत की आबादी सवा सौ करोड़ के पार पहुंच चुकी है, मगर खेलों के मामले में दुनिया में बड़ी जगह बनाना अब भी बाकी है। हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के पुत्र और पूर्व ओलंपियन अशोक ध्यानचंद का मानना है कि स्कूलों को ही खेलों की नर्सरी बनाना होगा, तब कहीं जाकर दुनिया में भारत खेलों के मामले में एक मुकाम हासिल कर पाएगा। देश की आजादी को 75 वर्ष पूरे हो गए हैं और इस मौके पर देश के बदले हालात पर चर्चा हो रही है। साथ ही आने वाले समय में क्या किया जाए इस पर भी विमर्श का दौर जारी है। वर्ष 1975 में विश्व कप जीतने वाली हॉकी टीम के सदस्य रहे अर्जुन अवॉर्डी अशोक कुमार का मानना है कि खिलाड़ियों की तलाश स्कूली काल से ही होना चाहिए और अगर बच्चे की प्रतिभा का सही आकलन कर लिया जाए तो उसे पढ़ाई के बोझ से दूर कर देना चाहिए। ऐसे बच्चों की मूल पढ़ाई उसकी पसंद और क्षमता का खेल होना चाहिए और शिक्षा महज औपचारिक रहे। इसके साथ ही जरूरत इस बात की भी है कि जो भी बच्चा खेल की दुनिया में प्रवेश करे, उसका जीवन सुरक्षित रहें, क्योंकि कई बार खेल के दौरान खिलाड़ी घायल हो जाता है और विषम परिस्थितियों से घिर जाता है तो ऐसे में उसके सामने आर्थिक संकट खड़ा होता है, इसलिए अच्छे खिलाड़ियों के लिए बीमा और इंसेंटिव की व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए। अशोक कुमार भारतीय खेलों की स्थिति को निराशाजनक मानते हैं। उनका कहना है कि देश को आजादी मिले 75 साल हो गए हैं, मगर हम कहां खड़े हैं यह सुखद तो नहीं कहा जा सकता। बात ओलंपिक की ही करें तो हमें बीते 75 सालों में हॉकी, कबड्डी के अलावा गिनती के ही खेलों में पदक मिल पाए हैं, इसका बड़ा कारण कहीं न कहीं राजनीतिक व्यवस्था को जिम्मेदार कहा जा सकता है, मगर यह भी सही है कि देश की आजादी के बाद कई तरह की समस्याएं और चुनौती भी कर रही है सरकारों के सामने। पूर्व की स्थिति का जिक्र करते हुए अशोक कुमार कहते हैं कि पहले शिक्षा का ही हिस्सा हुआ करता था खेल। कुल मिलाकर अगर पांच घंटे पढ़ाई होती थी तो छठवां घंटा खेल का हुआ करता था। तभी तो लोग कहते थे पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब खेलोगे कूदोगे तो होगे खराब। इस धारणा के चलते खिलाड़ी भी उन्हीं परिवारों से निकले जिन परिवारों में कभी कोई खिलाड़ी निकला। वैसे ही, जैसे किसी एक परिवार का सदस्य सेना में जाता है तो बाकी लोगों की इच्छा भी सेना में जाने की होती है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अशोक ध्यानचंद का कहना है कि पहले हर किलोमीटर दो किलोमीटर के दायरे में खेल मैदान हुआ करते थे, मगर अब ऐसा नहीं है। जो खेल मैदान थे वहां मंच बन गए हैं, तमाम निर्माण कार्य हो गए हैं और लोगों का रुझान भी कम हुआ है। आजादी के 75 बाद अब जाकर जो पहल हुई है, उसे लगता है कि खेल को दिशा मिलेगी। खेल विभाग को शिक्षा विभाग से अलग कर दिया गया है। इससे आगे निकलकर खेल जगत में आने वालों के भविष्य को सुरक्षित रखने की योजना बनानी होगी, तभी बेहतर खिलाड़ी निकल सकते हैं। –आईएएनएस एसएनपी/एसजीके

Advertisementspot_img

Also Read:

छुट्टी रद्द होते ही GenZ कर्मचारी का अनोखा रिएक्शन, एयरपोर्ट से बोलीं- अब 10 दिन बाद ही खुलेगा लैपटॉप

नई दिल्‍ली/रफ्तार डेस्‍क । सोचिए, आप फ्लाइट पकड़ने ही वाले हों और तभी ऑफिस से मैसेज आए कि आपकी छुट्टियां रद्द कर दी गई...
spot_img

Latest Stories

राम से हनुमान तक कंफर्म हुई Ramayana की पूरी कास्ट, जानिए कौन निभाएगा किसका रोल?

नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। नितेश तिवारी (Nitesh Tiwari) की...

रूहानी नाम का मतलब- Ruhaani Name Meaning

Meaning of Ruhaani /रूहानी नाम का मतलब: Spiritual/ आध्यात्मिक Origin...

जिम जाने वालों के लिए ये फल है खास, इसमें होता है जादा प्रोटीन

नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। आज के समय में सेहतमंद...

Asansol Dakshin Assembly Election 2026: इस सीट पर किसकी जीत? जानिए क्यों अहम है आसनसोल दक्षिण सीट?

नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। आसनसोल दक्षिण विधानसभा सीट West Bengal...
⌵ ⌵ ⌵ ⌵ Next Story Follows ⌵ ⌵ ⌵ ⌵