नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ अदालत के निर्देश पर FIR दर्ज होने के बाद संत समाज में असंतोष और चिंता का माहौल बन गया है। इस घटनाक्रम को लेकर कई धार्मिक संगठनों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है।
बड़ा उदासीन अखाड़ा के श्री महंत सूर्यमुनि ने मामले पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि शंकराचार्य जैसे उच्च पदस्थ धर्माचार्य पर कानूनी कार्रवाई केवल व्यक्तिगत विषय नहीं माना जा सकता, बल्कि यह करोड़ों सनातन श्रद्धालुओं की भावनाओं से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है। उन्होंने कहा कि यदि किसी भी धर्मगुरु, चाहे वह शंकराचार्य हों, मंडलेश्वर या महामंडलेश्वर पर आरोप लगाए जाते हैं, तो उनकी जांच पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ की जानी चाहिए। बिना पर्याप्त साक्ष्यों और विस्तृत जांच के की गई कार्रवाई से संत समाज और अनुयायियों की आस्था प्रभावित हो सकती है।
शंकराचार्य पर दर्ज केस को बताया पक्षपातपूर्ण
श्री महंत सूर्यमुनि ने कहा कि सनातन परंपरा में चारों शंकराचार्य धर्म व्यवस्था के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। ऐसे में उन पर लगाए गए आरोपों का असर केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक धार्मिक समाज पर पड़ता है। उन्होंने मांग की कि पूरे प्रकरण की जांच संवैधानिक दायरे में और पूरी निष्पक्षता के साथ की जाए, ताकि तथ्य स्पष्ट हों और न्याय की गरिमा अक्षुण्ण बनी रहे।
इस बीच, ईदगाह कमेटी के पूर्व अध्यक्ष हाजी नईम कुरैशी ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। उनका कहना है कि शंकराचार्य कोई सामान्य नागरिक नहीं, बल्कि देश के प्रतिष्ठित धर्मगुरु हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह मुकदमा दर्ज किया जाना दुर्भावना से प्रेरित प्रतीत होता है। कुरैशी ने यह भी कहा कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में बिना समुचित और पारदर्शी जांच के किसी धर्मगुरु के खिलाफ कार्रवाई करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।
निष्पक्ष जांच की मांग
इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि शंकराचार्य केवल हिंदू समाज ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय समेत विभिन्न वर्गों में भी सम्मानित माने जाते हैं। ऐसे में यदि कोई आरोप या विवाद सामने आता है, तो सबसे पहले तथ्यों की विस्तृत और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, उसके बाद ही कानूनी कदम उठाए जाने चाहिए थे। उनका कहना है कि धार्मिक विषयों से जुड़े मामलों में जल्दबाजी या असहिष्णुता का संदेश समाज में गलत प्रभाव डाल सकता है। इससे सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास पर भी असर पड़ता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे संवेदनशील प्रकरणों में संतुलित रवैया, आपसी संवाद और न्यायपूर्ण प्रक्रिया अपनाना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक पहचान है।





