नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। पुणे कार एक्टीडेंट मामले में एक्टीविस्ट अंजलि दामनिया ने आरोप लगाया है कि अजीत पवार ने हादसे के बाद पुणे पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार को फोन कर दबाव बनाया कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मामलेपर ज्यादा जोर ना दें। एक्टीविस्ट के दावे को लेकर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने कहा है कि वह नारको टेस्ट तक के लिए तैयार हैं, लेकिन अगर फिर भी दावा झूठा निकला तो क्या एक्टीविस्ट संयास ले लेगीं?
क्या बोले अजीत पवार?
एक समाचार एजंसी से बात करते हुए अजीत पवार ने कहा कि हम जनता के सेवक हैं, हमारे पास ऐसे कई फोन आते हैं। पवार ने कहा, “मैंने इस मामले में पुलिस कमिश्नर को फोन किया और कहा कि क्योंकि नाबालिग अमीर घराने से है, तो ऐसी आशंका है कि पुलिस के ऊपर दबाव बनाया जा सकता है। मैंने उन्हें साफ तौर पर कहा कि वे किसी भी राजनीतिक दबाव में ना आएं।” हालांकि जब पवार से एक्टीविस्ट के दावे को लेकर सवाल किया गया कि उन्होंने कॉल नाबालिग को बचाने के लिए किया और उनके फोन रिकॉर्ड मांगे गए है, उसका जबाव उन्होंने मराठी में देते हुए कहा, “मैं नारको टेस्ट के लिए तैयार हूं। लेकिन अगर मैं सही निकला तो क्या आप संयास लेकर घर पर शांति से बैठने को तैयार हैं?” पवार की यह टिप्पणी तब निकल कर सामने आई जब अस्पताल के डीन और एक राज्य चिकित्सा शिक्षा मंत्री के बीच जुबानी जंग हुई, जिसमें राजनीतिक एंगल भी निकल कर सामने आया।
क्या है राजनीतिक एंगल?
हसन मुशरिफ, जो अजित पवार की पार्टी से रिश्ता रखते है और राज्य चिकित्सा मंत्री है, उन्होंने कहा कि पार्टी के विधायक, सुनील टिंगरे के पत्र के बाद डॉक्टर तावड़े को नौकरी पर रखा गया था। उधर डीन का कहना है कि उनके पास कोई चमत्कारी शक्तियां नहीं हैं, जिससे वह अपने विभाग के हर शख्स के बारे में पूरी जानकारी रख सकें। तो वहीं, हसन मुशरिफ ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि उन्होंने केवल विधायक के लिखे पत्र को मंजूरी दी थी। साथ ही बोले कि यह डीन की जिम्मेदारी है, उन्हें सरकार को डॉक्टर अजय तावड़े के बारे में पहले ही बताना चाहिए था, जब सिफारिश की गई थी। तो वहीं डीन ने भी साफ तौर पर कहा कि उन्होंने केवल मंत्री के आदेशों का पालन किया।
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