नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। कांग्रेस नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने हाल ही में थलसेना में कटौती का विवादास्पद सुझाव दिया है। चव्हाण का कहना है कि भविष्य के युद्ध अब हवाई और मिसाइल तकनीक आधारित होंगे, और बड़ी पैदल सेना की जरूरत कम होती जा रही है। उन्होंने हालिया ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण दिया, जिसमें मई 2025 में पहलगाम में 26 नागरिकों की हत्या के जवाब में भारत ने पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों पर सटीक मिसाइल और हवाई हमले किए और थलसेना की कोई भूमिका नहीं रही। उनका तर्क है कि ऐसे युद्धों में बड़ी सेना की आवश्यकता कम पड़ती है।
चव्हाण के बयान पर भाजपा ने तीखा हमला बोला
हालांकि, चव्हाण के बयान पर भाजपा ने तीखा हमला बोला है। भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने इसे सेना का अपमान करार दिया और कहा कि यह मानसिकता सुरक्षा कम और सरेंडर ज्यादावाली है। उन्होंने चेताया कि ऐसे बयान सेना के मनोबल पर हमला हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।
भारत के लिए सुरक्षित रणनीति है
वहीं, जोखिम भी कम नहीं हैं। भारत की लंबी सीमाएं, विशेषकर चीन और पाकिस्तान से जुड़ी विवादित सीमाएँ, जमीनी घुसपैठ, आतंकवाद और इंसर्जेंसी रोकने के लिए बड़ी थलसेना की मांग करती हैं। क्षेत्रीय कब्जा या बचाव के लिए (जैसे कारगिल 1999 और गलवान 2020) ग्राउंड ट्रूप्स अनिवार्य हैं। अचानक बड़ी कटौती से सेना का मनोबल गिर सकता है और तैयारियां कमजोर पड़ सकती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि तकनीक अपनाते हुए सेना की संख्या स्थिर रखना ही भारत के लिए सुरक्षित रणनीति है।
वैश्विक स्तर पर भी स्थिति चव्हाण के सुझाव के विपरीत है
वैश्विक स्तर पर भी स्थिति चव्हाण के सुझाव के विपरीत है। SIPRI 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में वैश्विक सैन्य खर्च 2.718 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा, जो 2023 की तुलना में 9.4% अधिक है। पिछले 10 सालों में कुल खर्च में 37% वृद्धि हुई और 100 से अधिक देशों ने अपने बजट बढ़ाए।
बता दे कि, चव्हाण का सुझाव आधुनिक युद्ध की तकनीकी दिशा को सही रूप में दर्शाता है, लेकिन भारत जैसी लंबी सीमाओं और आतंकवाद खतरे वाले देश में थलसेना की बड़ी कटौती जोखिम भरी होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिकीकरण के साथ सेना की संख्या संतुलित रखी जानी चाहिए, ताकि देश की सुरक्षा और तकनीकी क्षमता दोनों मजबूत बने रहें।





