नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज अपना जन्मदिन मना रही हैं। इस मौके पर उन्होंने राष्ट्रपति भवन में स्कूली बच्चों से मुलाकात की और अपने जीवन के संघर्षों की कहानी साझा की। द्रौपदी मुर्मू का जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के एक छोटे से गांव उपरबेड़ा में हुआ था। वह संथाल जनजाति से आती हैं। उनके पिता बिरंची नारायण टुडू गांव के मुखिया थे। बचपन से ही उन्होंने अपने समाज की परेशानियों को करीब से देखा।
बोरे पर बैठकर की पढ़ाई
बच्चों के साथ बातचीत करते हुए राष्ट्रपति ने कहा,”हम लोग बोरे पर बैठकर पढ़ाई करते थे। स्कूल में टेबल-चेयर या टाइल वाली फर्श नहीं थी। यह बताते हुए उन्होंने बच्चों को प्रेरणा दी कि संघर्ष भरे हालातों के बावजूद भी शिक्षा से बड़ा कुछ नहीं होता। द्रौपदी मुर्मू ने रामदेवी विमेंस कॉलेज, भुवनेश्वर से स्नातक किया। उन्होंने श्री अरबिंदो इंटीग्रेटेड एजुकेशन सेंटर में शिक्षिका के रूप में कार्य किया। 1994 से 1997 तक उन्होंने प्राथमिक स्कूलों में भी पढ़ाया। इसके बाद ओडिशा सरकार के सिंचाई और ऊर्जा विभाग में भी काम किया।
राजनीतिक जीवन की शुरुआत
1997 में वह भाजपा से रायरंगपुर नगर पंचायत की पार्षद बनीं। 2000 में जब ओडिशा में भाजपा-बीजद की सरकार बनी, तो उन्हें राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया। उन्होंने वाणिज्य, परिवहन, मत्स्य पालन व पशुपालन विभाग में काम किया और आदिवासी क्षेत्रों के विकास पर जोर दिया। द्रौपदी मुर्मू का निजी जीवन कई गहरे दुखों से गुजरा। उन्होंने पति और दो बेटों को खो दिया। इन दुखों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि और मजबूत बना दिया। उन्होंने सेवा का रास्ता कभी नहीं छोड़ा।
राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति बनीं
2015 में वह झारखंड की पहली महिला और आदिवासी राज्यपाल बनीं। 2022 में उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए का उम्मीदवार बनाया गया। उन्होंने विपक्षी उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को हराया और 25 जुलाई 2022 को भारत की 15वीं राष्ट्रपति बनीं।





