नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने CBI डायरेक्टर की नियुक्ति में भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। भोपाल में नैशनल जूडिशियल एकेडमी के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि CBI प्रमुख जैसे पदों की नियुक्ति में CJI कैसे फैसला ले सकते हैं।
नियुक्ति प्रक्रिया में फिर से विचार करने की ज़रूरत
उपराष्ट्रपति ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों से सवाल करते हुए कहा कि, क्या इसमें कोई कानूनी दलील हो सकती है? उपराष्ट्रपति ने कहा, मैं इस बात की तारीफ कर सकता हूं कि कानून द्वारा बनाए गए नियम उस समय इसलिए बने, क्योंकि उस वक्त हमारी कार्यपालिका ने न्यायिक फैसले के आगे हार मान ली थी । लेकिन अब इस पर एक बार फिर सोचने की जरुरत है। क्योकि अब ये सब लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खा रहा। जो भारत के प्रधान न्यायाधीश जैसे लोग कैसे शीर्ष स्तर की नियुक्ति में शामिल हो सकते हैं।
जो समय-समय पर मतदाताओं के प्रति भी जवाबदेह होती हैं।
हम सभी संस्थानों को अपनी संवैधानिक सीमा के अंदर ही कार्य करना चाहिए, क्योकि सरकार ही देश या राज्य में कानून बनाने का काम करती है। जो समय-समय पर मतदाताओं के प्रति भी जवाबदेह होती हैं। लेकिन अगर सरकार ही अपने काम को किसी और संस्थान या दूसरे विभाग को सौंप दे जिसका इससे कोई लेना देना नही है तो इसका कौन जवाबदार होगा।
न्यायिक परीक्षण का अधिकार
धनखड़ ने कहा, न्यायिक परीक्षण का अधिकार एक अच्छी बात है, क्योंकि कानून संविधान के अनुरूप होंयहीं उचित है । क्योकि निर्णय स्वयं बोलते हैं। धनखड़ ने कहा, मैं वर्तमान स्थिति पर एक बार फिर करना चाहता हूं, ताकि एक ऐसी प्रणाली जो हमारी न्यायपालिका को श्रेष्ठता दे सके। अब हमें न्यायाधीशों का वह रूप नहीं मिलता जैसा हम सभी मुद्दों पर यहां देखते हैं। जिसके अनुसार संसद भारतीय संविधान की कुछ विशेषताओं में सुधार नहीं कर सकती।
बता दे कि, केशवानंद भारती मामले में पूर्व सॉलिसिटर जनरल अंध्या अर्जुन की पुस्तक में कहा गया है कि पुस्तक पढ़ने के बाद, मेरा विचार है कि संविधान के मूल ढांचे के नियम, एक बहस योग्य, न्यायशास्त्रीय आधार है।





