नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। देश में जब भी किसी भर्ती परीक्षा या एंट्रेंस एग्जाम का पेपर लीक होता है, तब सरकार की तरफ से सख्त कानून और कड़ी कार्रवाई का दावा किया जाता है। साल 2024 में केंद्र सरकार ने पेपर लीक पर रोक लगाने के लिए ‘सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 2024’ लागू किया था। उस समय कहा गया था कि अब पेपर लीक माफियाओं की कमर टूट जाएगी और दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।
कानून में क्या हैं सख्त प्रावधान?
इस कानून में 10 साल तक की जेल, 1 करोड़ रुपये जुर्माना और संपत्ति कुर्क करने जैसे बेहद सख्त प्रावधान किए गए थे। लेकिन दो साल बाद भी हालात ज्यादा बदले हुए नजर नहीं आ रहे हैं। हाल ही में सामने आए NEET UG 2026 विवाद ने एक बार फिर इस कानून की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल, कानून बनने के बाद उम्मीद थी कि बड़े पेपर लीक गिरोहों पर लगाम लगेगी, लेकिन अब तक ज्यादातर मामलों में छोटे कर्मचारी, डमी कैंडिडेट और सेंटर स्टाफ ही गिरफ्तार हुए हैं। जबकि असली सरगना और बड़े नेटवर्क अब भी कानून की पकड़ से बाहर दिखाई दे रहे हैं।
सॉल्वर गैंग और माफियाओं के लिए सबसे कड़ी सजा
इस कानून के तहत अलग-अलग अपराधों के लिए अलग सजा तय की गई है। यदि कोई व्यक्ति परीक्षा में नकल करता है, अवैध तरीके से आंसर-की हासिल करता है या किसी अभ्यर्थी की गलत तरीके से मदद करता है, तो उसे 3 से 5 साल तक की जेल और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। वहीं अगर कोई परीक्षा एजेंसी, कंप्यूटर सेंटर या प्राइवेट कंपनी पेपर लीक में शामिल पाई जाती है, तो उस पर 1 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। साथ ही एजेंसी को ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है। अगर कंपनी के बड़े अधिकारियों की भूमिका सामने आती है, तो उन्हें 10 साल तक की जेल और व्यक्तिगत जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।
फिर भी क्यों नहीं रुक रहे पेपर लीक?
कानून में सबसे कड़ी सजा संगठित गिरोहों और सॉल्वर गैंग के लिए रखी गई है। ऐसे मामलों में दोषियों को 5 से 10 साल तक की जेल, कम से कम 1 करोड़ रुपये जुर्माना और संपत्ति कुर्क करने जैसी कार्रवाई का प्रावधान है। हालांकि सवाल यह है कि इतना सख्त कानून होने के बावजूद पेपर लीक की घटनाएं क्यों नहीं रुक रहीं? विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह कानून की कमजोरियां और जांच प्रक्रिया में देरी है।
बड़े अफसर ‘गुड फेथ’ की आड़ में बच निकलते हैं
कानून में एक ऐसा प्रावधान भी है, जो परीक्षा कराने वाली एजेंसियों और अधिकारियों को ‘सद्भावना में किए गए कार्य’ के नाम पर सुरक्षा देता है। ऐसे में कई बार बड़ी गड़बड़ियों को ‘तकनीकी खराबी’ या ‘सिस्टम ग्लिच’ बताकर मामला ठंडा कर दिया जाता है।
अदालतों में फैसले आने में लग रहा लंबा समय
इसके अलावा अदालतों में मामलों के फैसले आने में लंबा समय लग रहा है। कानून गैर-जमानती जरूर है, लेकिन अभी तक किसी बड़े पेपर लीक माफिया को जल्दी और निर्णायक सजा नहीं मिल पाई है। यही वजह है कि अपराधियों में कानून का डर कम दिखाई देता है।
फेक न्यूज फैलाने वालों पर भी होगी कार्रवाई
इस कानून में सोशल मीडिया पर फर्जी पेपर, नकली आंसर-की या अफवाह फैलाने वालों पर भी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया है। यदि कोई व्यक्ति परीक्षा प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली झूठी जानकारी फैलाता है, तो उसे भी दोषी माना जा सकता है।
युवाओं का भरोसा टूट रहा है
लगातार हो रहे पेपर लीक मामलों से देश के लाखों युवाओं में नाराजगी बढ़ती जा रही है। छात्र अब सिर्फ सख्त कानून और बड़े दावों से संतुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि असली पेपर लीक माफियाओं पर तेज और कड़ी कार्रवाई हो, ताकि मेहनत करने वाले युवाओं का भविष्य सुरक्षित रह सके।





