कोलकाता, 17 मार्च (हि.स.)। देश के अन्य भागों की तरह अब पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक पार्टियाें का जातियों और उपजातियों को रिझाने का खेल शुरू हो गया। माना जाता था कि अभी तक पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐसी नहीं होता था। अभी तक विकास, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे मौलिक मुद्दों को गौण बनाकर बिहार और उत्तर प्रदेश में ही जाति की राजनीति होती रही है। अब बंगाल में भी इसका असर दिख रहा है। दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य में भाजपा की शानदार बढ़त के बाद ममता बनर्जी ने अपनी सरकार बचाए रखने के लिए प्रशांत किशोर को नियुक्त किया, जो मूल रूप से बिहार के हैं। किशोर के आते ही बंगाल में भी जातिगत राजनीति की एंट्री हो गई है। अभी हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बंगाल के मनीषी व तेली समुदाय के लिए विशेष संरक्षण की घोषणा की, तो ममता ने भी बुधवार को गोपीबल्लवपुर की रैली से इसी समुदाय के लिए विशेष पहल की घोषणा की। राजनीतिज्ञों की मानें तो बंगाल की राजनीति में पहले कास्ट फैक्टर नहीं था, लेकिन अब बंगाल की राजनीति में भी कास्ट फैक्टर की एंट्री हो गई है। इसी तरह मतुआ सहित ओबीसी जातियों और समुदायों को लुभाने में भाजपा और तृणमूल दोनों ही जुटी हुई हैं। ममता बनर्जी ने कुर्मी जाति को अति पिछड़े में शामिल करने की मांग तक कर डाली है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने तेली सहित अन्य जातियों को ओबीसी में शामिल करने का वादा कर बड़ा ऐलान किया है। इससे पहले 34 साल के शासन में लेफ्ट ने बुर्जुआ और सर्वहारा को अपने शासन का आधार बनाया था और लंबे समय तक शासन किया था, लेकिन साल 2011 में तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी जब सत्ता में आई, तो स्थिति बदल गई और जातियों और उपजातियों को साधने का खेल शुरू हो गया है। बाउड़ी, बागदी, मतुआ के लिए बोर्ड बनाए गए। रघुनाथ मुर्मु और बिरसा मुंडा के जन्म दिन पर छुट्टियों की घोषणा की गई। पश्चिम बंगाल की राजनीति में पहली बार मतुआ समुदाय का वोट बैंक के रूप में देखा गया। इस समुदाय ने ममता का समर्थन किया जिससे तृणमूल को सरकार बनाने में मदद मिली। बंगाल में पिछड़ी जाति ‘नामशुद्रों’ की नुमाइंदगी करने वाले मतुआ महासंघ ने राजनीतिक तौर पर अपनी अहमियत दिखाई और कुछ हद तक राज्य के जातिगत समीकरणों को बदल डाला। ममता बनर्जी ने अपने 10 वर्ष के शासन में उपजातियों पर फोकस करना शुरू किया। राज्य की लगभग 60 हिंदू उपजातियां एससी कैटेगरी में आती हैं। इनमें से प्रमुख राजवंशी, जो कुल एससी आबादी का 18.4 फीसदी है। ऐसे ही नामशुद्र 17.4 फीसदी और बागड़ी 14.9 फीसदी हैं। भाजपा ने मतुआ समुदाय से शांतनु ठाकुर को एमपी बनाया, तो मतुआ समुदाय को लुभाने के लिए नागरिकता संशोधन कानून में संशोधन किया। पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान के साथ ही ओबीसी जातियों को लुभाने की कवायद तेज हो गई है। राज्य में करीब 62 ओबीसी समूह हैं। उत्तर बंगाल के राजवंशी अपनी अलग पहचान के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं। हाल में दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से राजवंशी प्रतिनिधियों ने मुलाकात की थी। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री के नाते ममता बनर्जी ने ऐसे अधिकतर वर्गों की पहचान की और उनसे मुखातिब हुईं। इनमें मुस्लिमों में शेख और दार्जिलिंग में गोरखाओं के अलावा लेप्चा शामिल हैं। राजवंशी अनुसूचित जाति में आते हैं और उत्तर बंगाल में इनकी खासी संख्या है। विशेष तौर पर कूचबिहार जिले में इनकी बड़ी संख्या है। ममता ने इन उपजातियों और समुदायों के लिए अलग-अलग बोर्ड बनाया है। इस वर्ष पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, लेफ्ट और तृणमूल की 30 फीसदी मुस्लिम समुदाय पर निगाहें हैं, जबकि भाजपा अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है। उल्लेखनीय है कि 2011 की जनगणना के दौरान राज्य में जनजातीय आबादी 52 लाख 90 हजार थी, जो कुल आबादी का लगभग 5.8 फीसदी है। अनुसूचित जाति की आबादी यहां की कुल 9 करोड़ 13 लाख आबादी का 23.51 फीसदी यानी 2 करोड़ 14 लाख थी। राज्य की कुल जनसंख्या अब 10 करोड़ 19 लाख होने का अनुमान है। सबसे अधिक आदिवासी आबादी दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, दक्षिण दिनाजपुर, पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुड़ा और पुरुलिया जिलों में है। राज्य में एसटी के लिए 16 आरक्षित सीटें और एससी के लिए 68 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। इन्हीं को आधार बनाकर भाजपा ने लोकसभा चुनाव में 18 सीटों पर जीत हासिल की थी। अब उसी समीकरण को विधानसभा में भी दोहराया जा रहा है। हिन्दुस्थान समाचार / ओम प्रकाश




