नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । केन्द्र में रक्षा मंत्री और चार बार गोवा के मुख्यमंत्री रहे सादगी की प्रतिमूर्ति मनोहर गोपालकृष्ण प्रभु पर्रिकर की आज (13 दिसंबर) जयंती है। इस अवसर पर तमाम राजनेता उन्हें याद कर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सादगी के सभी कायल थे। मनोहर पर्रिकर ऐसे राजनेता थे, जो सत्ता में नहीं रहकर भी सरकार को झुकने पर मजबूर कर देते थे। वे आम लोगों के लिए लड़ते और जीतते भी थे। चार बार गोवा के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद वे कई सालों तक सीएम हाउस में नहीं रहे। अपने दफ्तर भी स्कूटी से ही चले जाते थे। बिना किसी तामझाम और बिना सुरक्षा के वे किसी भी चौराहे पर खड़े होकर चाय पीते नजर आ जाते थे।
आज के दौर में जब एक विधायक भी अपने साथ 10-20 गाड़ियों का काफिला और सुरक्ष के तामझाम लेकर चलता है, ऐसे में कोई यह कैसे सोच सकता था कि कोई राजनेता गोवा का चार बार मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री मोदी की केन्द्र सरकार में रक्षा मंत्री भी रहा होगा, लेकिन मनोहर पर्रिकर किसी के लिए जनता के मुख्यमंत्री थे, तो किसी के लिए स्कूटर वाला और किसी के लिए सादगी पसंद मुख्यमंत्री। ऐसे सादगी से भरे जननायक और लोकप्रिय राजनेता दिवंगत मनोहर पर्रिकर की आज जयंती है। इस मौके पर उनकी एक ऐसी इच्छा का जिक्र करना यहां प्रासंगिक होगा, जो अधूरी रह गई थी। गोवा के चौथी बार मुख्यमंत्री रहते हुए 17 मार्च 2019 को मनोहर पर्रिकर का कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद 63 साल की उम्र में निधन हो गया था। वे अपनी जिंदगी के अंतिम 10 साल खुद के लिए जीना चाहते थें, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। उन्होंने स्वयं इस बात का खुलासा एक साक्षात्कार में किया था।
कैंसर जैसी घातक बीमारी ने जकड़ लिया था
दरअसल, मनोहर पर्रिकर साल 20217 में देश के रक्षा मंत्री का दायित्व संभाल रहे थे। इसी बीच गोवा में चुनाव हुए और भाजपा गठबंधन ने बहुमत हासिल कर लिया। तब वे रक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देकर मार्च 2017 में अपने गृह राज्य लौट आए और मुख्यमंत्री का दायित्व संभाल लिया। इसी बीच उन्हें कैंसर जैसी घातक बीमारी ने जकड़ लिया। हालांकि, कैंसर से जूझते हुए एक साल से ज्यादा समय तक वे मुख्यमंत्री के पद पर रहे। उन्होंने मुख्यमंत्री का पद संभालने से पहले ही यह घोषणा कर दी थी कि यह उनका अंतिम कार्यकाल है और आगे से वे चुनाव नहीं लड़ेंगे। उन्होंने एक टीवी चैनल पर बातचीत में कहा था कि मैं अपनी ज़िंदगी के आखिरी 10 वर्ष स्वयं के लिए जीना चाहता हूं। ये मेरा आखिरी कार्यकाल है। इसके बाद मैं न तो चुनाव लड़ूंगा और न किसी चुनाव का हिस्सा बनूंगा, पार्टी की ओर से चाहे कितना ही दबाव आए।
आईआईटी डिग्री प्राप्त करने वाले राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे
मनोहर पर्रिकर ऐसे राजनेता थे, जिनके साथ बहुत सारे फर्स्ट जुड़े हुए हैं। यानी उनके नाम से कई ऐसे काम जुड़े हुए हैं, जो उनसे पहले कोई और नहीं कर पाया। मसलन, पर्रिकर देश के किसी भी राज्य के पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने आईआईटी की डिग्री प्राप्त कर थी। उनहोंने देश के प्रतिष्ठित मुंबई आईआईटी से बीटेक की डिग्री ले रखी थी। हालांकि बाद में आईआईटी डिग्री धारी अरविंद केजरीवाल भी दिल्ली के मुख्यमंत्री बने, लेकिन पर्रिकर का नाम इस मामले में सबसे पहले आता है। वे गोवा से केन्द्र सरकार में मंत्री बनने वाले पहले थे। उनसे पहले गोवा से कोई भी नेता केन्द्र में मंत्री नहीं बना था।
भाजपा को गोवा की सत्ता तक पहुंचाने में निभाई अहम भूमिका
गोवा के मापुसा में एक गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवार में 13 दिसंबर 1955 में जन्मे मनोहर पर्रिकर बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से प्रभावित थे और इस राष्ट्रवादी संगठन से वे शुरुआती जीवन में ही जुड़ गए थे। आईआईटी बॉम्बे से मैटलर्जी की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने गोवा में न्यूमेटिक पंप बनाने वाली एक फैक्ट्री की शुरुआत की, लेकिन इसी बीच 1980 के दशक में भाजपा ने गोवा पर अपनी पकड़ बनाने के लिए संघ से कुछ कैडर की मांग की तो संघ ने लक्ष्मीकांत पारसेकर और मनोहर पर्रिकर को भाजपा में भेज दिया। उस समय गोवा में महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) का वहां की पिछड़ी जातियों में काफ़ी मज़बूत जनाधार था। भाजपा ने 1989 में गोवा विधानसभा का चुनाव पहली बार लड़ा और उसे एक प्रतिशत से भी कम वोट प्राप्त हुए, लेकिन पर्रिकर मैदान में डटे रहे। उन्होंने अपनी राजनीतिक सूझबूझ और सांगठनिक कौशल के दम पर एक दशक में ही भाजपा को गोवा की सत्ता तक पहुंचाने में सफलता हासिल कर ली। उनकी ईमानदार छवि और कड़ी मेहनत ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उनकी इस छवि से प्रशासन में भी काफी सुधार हुआ।
सादगी के प्रतीक थे पर्रिकर
आधी बांह की शर्ट और पैरों में सैंडल पर्रिकर की सादगी की प्रतीक बन गई, लेकिन उनकी चुपचाप काम करने की शैली इनमें सबसे अहम थी। उन्होंने गोवा का मुख्यमंत्री बनने के कई सामाजिक कल्याण की योजनाएं शुरू की। गोवा में नई-नई सड़कें बनीं और बिजली आपूर्ति की व्यवस्था भी काफी सुधरी। उन्होंने विपक्ष में रहकर मांडवी नदी में कैसिनों के मामले में कांग्रेस की दिगम्बर कामत सरकार को बैकफुट पर आने को मज़बूर कर दियया था। पर्रिकर ने जनता से जुड़ी समस्याओं को मुद्दा बनाया, फिर चाहे वह राज्य में अवैध खनन हो या इंग्लिश मीडियम के स्कूलों को अनुदान देने का मामला। साल 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले यानी 2013 में पर्रिकर का नाम तब सुर्खियों में आया था, जब उन्होंने पार्टी के सम्मेलन में चुनाव प्रचार के लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम प्रमुख के रूप में आगे रखने का प्रस्ताव दिया था। तब लालकृष्ण आड़वाणी ने इस प्रस्ताव का जमकर विरोध कया था। पर्रिकर ने 2009 में आडवाणी के बारे में यहां तक कह दिया था कि वे बासी और सड़ता हुआ अचार हैं और उनकी राजनीतिक पारी अब ख़त्म हो चुकी है।
बहरहाल, 2014 में केन्द्र में भाजपा नीत एनडीए की सरकार सत्ता में आ गई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। तब मोदी ने पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री पद छोड़कर केन्द्र में कैबिनेट मंत्री बनने का ऑफ़र दिया। वे देश के रक्षा मंत्री बने। उन्होंने अपने कार्यकाल मे सबसे पहले रक्षा सामग्रियों की ख़रीदी प्रक्रिया को आसान बनाया।




