नई दिल्ली, रफ्तार न्यूज। जयप्रकाश नारायण, जिन्हें जेपी और लोक नायक के नाम से भी जाना जाता है। जेपी का जन्म 11 अक्टूबर 1902 में बिहार के सारण जिले में हुआ। उनका जीवन संघर्ष, प्रेरणा और असीमित समर्पण से भरा हुआ था। उन्होंने युवा अवस्था में ही समाजवाद की विचारधारा को अपनाया और बाद में महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांतों को अपनाया। उनके जीवन के कई किस्से आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं।
असहयोग आंदलोन में दिया योगदान
1920 में, जब जयप्रकाश पटना कॉलेज में विज्ञान की पढ़ाई कर रहे थे। उनकी परीक्षा में 20 दिन ही बचे थे कि महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया। पटना में जब मौलाना आज़ाद ने छात्रों से ब्रिटिश सरकार द्वारा चलाने जाने वाले स्कूल कॉलेज के असहयोग करते का ऐलान किया तभी जेपी ने अपने कॉलेज से बाहर निकलकर डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा स्थापित बिहार विद्यापीठ में दाखिला लिया। यह निर्णय उनके जीवन की दिशा बदलने वाला था। 1922 में, उन्होंने भारत को अलविदा कहकर अमेरिका जाने का निर्णय लिया, जहां उन्होंने बर्कले विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान की पढ़ाई शुरू की। यहां उन्होंने मार्क्स, लेनिन और ट्रॉट्स्की के विचारों का गहन अध्ययन किया, जो उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को आकार देने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
अमेरिका से भारत लौटने तक का सफर
नारायण की जिंदगी में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब 1929 में उन्होंने भारत लौटने का निर्णय लिया। उस समय उनकी पत्नी प्रभावती भारत में उनकी स्वतंत्रता संग्राम की तैयारी में शामिल हो गई थीं। 1942 में, उन्हें हजारीबाग जेल में बंद कर दिया गया। वहां, दीपावली के दिन उन्होंने और उनके अन्य साथी कैदियों ने जेल से भागने की योजना बनाई। 56 धोतियों का उपयोग करके उन्होंने जेल की दीवार को पार किया।
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सामाजिक न्याय की मांग में जेपी का योगदान
नारायण ने अपने विचारों को साझा करने और लोगों को प्रेरित करने का कार्य निरंतर किया। उनका “संपूर्ण क्रांति” का आह्वान भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ लाया। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई और सामाजिक न्याय की मांग की। उनका मानना था कि क्रांति केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों और सिद्धांतों से भी हो सकती है।
मार्टिन लूथर किंग जूनियर जेपी के विचारों से प्रभावित थे
1959 में, जब मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने भारत की यात्रा की तो जयप्रकाश नारायण से मिलकर उनके विचारों से प्रभावित हुए। किंग ने अपने पत्र में लिखा- “आपका समर्पण और मानवता की सेवा के प्रति आपकी भावना ने मुझे गहराई से प्रभावित किया”।
अहिंसा और समाजवादी सोच रखते थे
जयप्रकाश नारायण ने जीवनभर अहिंसा, समाजवाद और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया। 1979 में उनकी मृत्यु के बाद भी, उनका नाम भारतीय राजनीति में एक प्रेरणास्त्रोत के रूप में जीवित है। उनका योगदान न केवल स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण था, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज को एक नई दिशा देने का कार्य भी किया। उनके विचारों ने कई पीढ़ियों को प्रेरित किया और आज भी उनके सिद्धांतों का महत्व बना हुआ है।
भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया गया
जयप्रकाश नारायण की मृत्यु 8 अक्टूबर 1979 को हुई थी। इसके बाद साल 1999 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।





