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Monday, March 30, 2026
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Haryana Assembly Elections: हरियाणा की राजनीति में खाप का कितना है असर, क्यों इस बार BJP को सता रहा हार का डर?

हरियाणा विधानसभा चुनाव में खापों का बेहद महत्व है। कहा जाता है कि खापें जिस पार्टी की तरफ होती हैं, उनकी जीत निश्चित होती है। इस बार खापों ने बीजेपी को हराने वाले उम्मीदवारों को समर्थन दिया है।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। नई दिल्ली से सटे राज्य हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने जा रहा है। हरियाणा विधानसभा चुनाव में लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के बीच मानी जा रही है। एक तरफ जहां बीजेपी सूबे की सत्ता में हैट्रिक लगाने का प्रयास कर रही है, तो वहीं पिछले 10 सालों से सत्ता सुख से बाहर कांग्रेस इस बार कमबैक करने के लिए हर जतन कर रही है। इसी का एक हिस्सा विनेश फोगाट को जुलाना सीट से उतारना रहा है। हरियाणा की राजनीति में इस समय एक बात की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है कि इस चुनाव में ‘खापें’ किसका समर्थन कर रही हैं। दरअसल हरियाणा एक जाट बाहुल्य सूबा है और जाटों की पहचान खापों से होती है। सभी पार्टियां ये चाह रही हैं कि उन्हें खापों का समर्थन मिले। इसको लेकर वो कई तरह के लोक लुभावन वादे भी कर रहे हैं। आइये जानते हैं कि खाप क्या होता है और हरियाणा की राजनीति में इसका क्या महत्व है?

खाप क्या है?

खाप का अर्थ होता है समूह। इसमें एक गोत्र के लोग मिलकर खाप का गठन करते हैं। इनका मुख्य काम किसी विषय पर सामूहिक राय बनाना और उसपर अमल करना होता है। खाप कई गांवों को मिलाकर भी बनाये जाते हैं। ये गांव या समाज में होने वाले छोटे-मोटे विवादों का निपटारा करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। खाप पंचायतें कई बार अपने तालिबानी फरमानों को लेकर भी विवादों में रही हैं, लेकिन इससे इनका सामाजिक महत्व कम नहीं हो जाता है। खापों का फरमान संबंधित गोत्र, बिरादरी या गांवों के लिए अंतिम फैसला होता है। वहीं जब किसी मामले को लेकर सामूहिक निर्णय लेना होता है तब सभी खापें मिलकर एक राय बनाकर निर्णय देती है।

जाट पॉलिटिक्स में खापों का है महत्वपूर्ण स्थान

हरियाणा में सबसे अधिक जनसंख्या जाटों की है और खाप इनके पहचान से जुड़ी है। सूबे में फिलहाल 120 खाप हैं, जिसमें सर्व खाप, फोगाट खाप, मलिक खाप, सांगवान खाप, धनखड़, सतगामा, जाखड़, महम चौबीसी, मलिक, कंडेला, गठवाला मलिक, हुड्डा और कंडेला प्रमुख है। कंडेला खाप की कमान धर्मपाल कंडेला के हाथों में है, तो वहीं सतबास खाप की कमान बलवान सिंह मलिक के पास है। इसके अलावा खाप राजनीति में फोगाट खाप के प्रमुख बलवंत नंबरदार भी काफी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

खापों के आगे कई बार झुकी हैं सरकारें

हरियाणा की सियासत में खापों का हमेशा से मजबूत स्थान रहा है। हालांकि 2014 के बाद हरियाणा में खाप पॉलिटिक्स का असर थोड़ा कम हुआ है, लेकिन उनके महत्व को कोई नकार नहीं सकता। क्योंकि खापें जातीय गोलबंदी में टूलकिट की तरह काम करती हैं। इसी कारण कई बार सरकारें उनके सामने घुटने टेक चुकी हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1989 में देखने को मिला। उस दौरान भारत के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह थे। उस समय देवीलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री थे। सरकार बनने के बाद देवीलाल भारत के उप प्रधानमंत्री चुने गए। जिसके चलते उन्हें हरियाणा की कुर्सी छोड़नी पड़ी। वो महम से विधायक थे और हमेशा महम चौबीसी खाप के समर्थन से चुनाव जीतते आ रहे थे।

महम कांड के बाद ओपी चौटाला को चटाई थी धूल

देवीलाल के जाने के बाद उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला सियासत में एक्टिव हुए और उन्होंने हरियाणा की कमान संभाली। इसी दौरान वो महम सीट से चुनावी मैदान में उतरे। इस चुनाव में महम चौबीसी ने चौटाला के खिलाफ आनंद सिंह डांगी को समर्थन दे दिया। इस चुनाव में इतनी हिंसा हुई कि चुनाव को कई बार टाल दिया गया। बाद में उन्हें सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा। जब चुनाव हुए तो खाप ने फिर से दांगी का समर्थन किया। जिसके बाद ओम प्रकाश चौटाला को करारी शिकस्त मिली।

महिला पहलवान आंदोलन में भी दिखाई थी अपनी ताकत

खापों का असर हाल ही में एक बार फिर देखने को मिला। जब दिल्ली में महिला पहलवानों का धरना प्रदर्शन चल रहा था। इस दौरान पहलवान बीजेपी सांसद और बाहुबली बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे, लेकिन सरकार उनकी मांगों को नहीं सुन रही थी। तब खापें मैदान में उतरी और सरकार को अल्टीमेटम देते हुए 9 जून का वक्त दिया। फिर सरकार को झुकना पड़ा और जंतर-मंतर पर बैठे पहलवानों को गृह मंत्री से बातचीत करने का बुलावा आया।

चुनावों में कितनी असरदार हैं खापें?

हरियाणा की राजनीति में हमेशा से खापों का दखल रहा है। खापों के समर्थन को जीत की गारंटी मानी जाती है। हालांकि 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव के बाद खापों का राजनीति पर से असर थोड़ा कम हुआ है। खापों ने तब कांग्रेस के समर्थन का ऐलान किया था। उस समय चुनावी मैदान में उतरे गठवाला खाप के चौधरी दादा बलजीत सिंह और अन्य खाप से जुड़ी संतोष दहिया भी खुद चुनाव हार गए थे।

2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को दिया था समर्थन

हालांकि 2019 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर खापों का असर देखने को मिला। उस दौरान खापों के समर्थन से हरियाणा में कांग्रेस मजबूत स्थिति में आ गई। वहीं पहलवान आंदोलन के बाद हुए 2024 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को खापों का समर्थन मिला। जिसकी वजह से हरियाणा में कांग्रेस 5 सीटें जीतने में सफल रही। हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 में भी अधिकतर खापों का कांग्रेस को समर्थन है। खापों ने बीजेपी को हराने वाले उम्मीदवारों को समर्थन देने का ऐलान किया है।

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