नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। इन दिनों धार्मिक ग्रंथों पर आधारित फिल्मों और वेब सीरीज की बाढ़ सी आ गई है। चाहे वो प्रभास की ‘आदिपुरुष’ हो या रणबीर कपूर की आने वाली ‘रामायण’ – सवाल यही है कि क्या इन ग्रंथों पर फिल्म बनाना कानूनी तौर पर सही है? क्या रामायण या महाभारत जैसे ग्रंथों पर कॉपीराइट लागू होता है? चलिए जानते हैं इस पर कानून क्या कहता है।
क्या होता है कॉपीराइट कानून?
भारत में कॉपीराइट अधिनियम, 1957 लागू है, जो मूल लेखन, संगीत, कला, फिल्म और अन्य रचनात्मक कार्यों के रचनाकारों के अधिकारों की रक्षा करता है। इस कानून के अनुसार, किसी भी मूल रचना का बिना अनुमति उपयोग करना गैरकानूनी है और इसके लिए कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।
धर्मग्रंथों पर लागू होता है ये कानून?
इस सवाल का सीधा जवाब हां और नहीं दोनों है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2023 में एक मामले में साफ कहा था कि: “रामायण, महाभारत या भगवद् गीता जैसे ग्रंथों पर कोई कॉपीराइट का दावा नहीं किया जा सकता। क्यों? क्योंकि ये ग्रंथ पब्लिक डोमेन में आते हैं, यानी सैकड़ों साल पुराने हैं और किसी एक लेखक के नाम से नहीं जुड़े हैं। इसलिए इनका उपयोग किसी भी रचनात्मक कार्य (जैसे फिल्म या नाटक) में किया जा सकता है। जो भी फिल्म निर्माता धार्मिक ग्रंथों पर आधारित फिल्म बना रहे हैं, उन्हें चाहिए कि मूल ग्रंथ से प्रेरणा लें, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति के बनाए गए स्क्रिप्ट या रूपांतरण की नकल न करें। साथ ही, धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी जरूरी है, क्योंकि ये विषय भावनात्मक रूप से संवेदनशील होते हैं।
धार्मिक फिल्मों की बाढ़ और विवाद
पिछले कुछ वर्षों में ‘आदिपुरुष’, ‘ओह माई गॉड 2’, ‘ब्रह्मास्त्र’, और ‘कल्कि 2898 AD’ जैसी फिल्मों ने धार्मिक ग्रंथों और किरदारों को आधुनिक नजरिए से पेश किया है। कुछ सफल रहीं, तो कुछ पर विवाद हुआ। इससे यह भी साफ होता है कि सिर्फ फिल्म बनाना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बनाना भी जरूरी है। लेकिन अगर आप किसी की बनाई हुई स्क्रिप्ट या रूपांतरण की कॉपी करते हैं, तो वह कॉपीराइट उल्लंघन माना जाएगा। इसलिए कलाकारों और मेकर्स को चाहिए कि अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल करें, और कानून व भावनाओं, दोनों का सम्मान करें।





