नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । भारत के संविधान में वर्ष 1976 के 42वें संशोधन के जरिए जोड़े गए दो प्रमुख शब्द ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गए हैं। हाल ही में आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले द्वारा संविधान की समीक्षा की बात कहने के बाद इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है। हालांकि यह विवाद नया नहीं है। वर्ष 2015 में भी, जब बिहार विधानसभा चुनाव का माहौल गर्म था, तब RSS प्रमुख मोहन भागवत द्वारा धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को लेकर दिए गए बयान से राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई थी। अब एक बार फिर इस मुद्दे पर बहस तेज हो चली है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार संविधान में बदलाव करने की मंशा रखती है।
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) इस मुद्दे को हाथो हाथ पकड़ लिया और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर संविधान की मूल भावना से छेड़छाड़ का आरोप लगा रही है। दूसरी ओर, भाजपा अपने स्टैंड पर अडिग दिख रही है और विपक्ष के आरोपों को खारिज कर रही है। इसी बीच, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इस मुद्दे पर सामने आए हैं। उनकी प्रतिक्रिया के बाद यह बहस और तेज हो गई है।
क्या बोले शिवराज सिंह चौहान ?
वाराणसी दौरे के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत को समाजवाद की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय संस्कृति की मूल भावना नहीं है। उनका यह बयान उस वक्त सामने आया जब आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में संविधान की प्रस्तावना में किए गए संशोधनों पर सवाल उठाए। होसबोले ने कहा था कि, “बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा निर्मित मूल संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ जैसे शब्द शामिल नहीं थे। ये शब्द उस दौर में जोड़े गए जब देश में आपातकाल लगा था, मौलिक अधिकार निलंबित थे, संसद की कार्यवाही ठप थी और न्यायपालिका निष्क्रिय स्थिति में थी।”
“भारत को समाजवाद की आवश्यकता नहीं”
वाराणसी में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि “भारत जैसे देश में समाजवाद की कोई जरूरत नहीं है।” उन्होंने यह भी कहा कि “धर्मनिरपेक्षता हमारी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा नहीं रही है, इसलिए इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।”
वहीं, संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों की समीक्षा के लिए आरएसएस द्वारा दिए गए सुझाव का परोक्ष रूप से समर्थन करते हुए केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने शुक्रवार को कहा कि “कोई भी तर्कसंगत सोच रखने वाला नागरिक इस विचार का समर्थन करेगा, क्योंकि यह सभी को ज्ञात है कि ये शब्द डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा तैयार किए गए मूल संविधान में शामिल नहीं थे।”




