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Tuesday, March 31, 2026
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Shibu Soren Death: नेमरा के शिबू सोरेन कैसे बने झारखंड के दिशोम गुरू, जमीनी संघर्ष ने दिलाई थी पहचान

झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और सीएम हेमंत सोरेन के पिता दिशोम गुरु यानी शिबू सोरेन का निधन हो गया है।

नई दिल्‍ली, रफ्तार डेस्‍क । झारखंड मुक्ति मोर्चा और राज्‍य के मुख्‍यमंत्री हेमंत सोरेन को एक बड़ा झटका लगा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्‍थापक, संरक्षक और सीएम हेमंत सोरेन के पिता दिशोम गुरु यानी शिबू सोरेन का निधन हो गया हे। शिबू सोरेन का 81 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्‍होने दिल्‍ली के सर गंगाराम अस्‍पताल में अंतिम सांस ली। 

शिबू सोरेन पिछले डेढ़ महीने से अस्पताल में भर्ती थे। उन्‍हे ब्रेन स्ट्रोक आया था। इससे उनके शरीर के बाईं ओर पैरालिसिस हो गया था। इसी के चलते उन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती किया गया था। इलाज चल रहा था लेकिन 4 अगस्त को दिल्ली के एक अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें 4 जुलाई सुबह 8.56 बजे मृत घोषित किया गया। उनके निधन के बाद झारखंड में शोक की लहर है। तो वही, कई राजनीति दल और नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्‍यक्‍त किया है।  

झारखंड राज्य की असीमता और स्वाधीनता की लड़ाई में उनका योगदान महत्‍वपूर्ण रहा है। उन्‍होने झारखंड राज्य की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने वाले शिबू सोरेन को झारखंड में दिशोम गुरु के नाम से जाना जाता है। दिशोम गुरु यानी जंगल का नेता। वे झारखंड के मुख्‍यमंत्री और यूपीए सरकार में केंद्रीय कोयल मंत्री भी रह चुके है। 2020 में राज्‍यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। 

उन्‍हें आदिवाासियों का मसीह भी कहा जाता है। आज भी जनजाति समुदाय की बीच वह दिशोम गुरु के नाम जाने जाते है। लेकिन ये उपाधि उन्हें क्यों दी गई। ये जानने के लिए हमें उनके जीवन पर नजर डालनी होगी।

संघर्षों से भरा है शिबू सोरेन का जीवन 

 

झारखंड के पूर्व सीएम और राज्‍यसभा सांसद शिबू सोरेन का जीवन काफी कठिन और संघर्ष भरा रहा है। 81 साल के दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जन्म वर्तमान रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड के नेमरा में 11 जनवरी 1944 को हुआ। गांव के ही स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्‍त के लिए दिशोम गुरु का जीवन संघर्षों से भरा रहा है।

महजनों और सूदखोरों के खिलाफ चलाया आंदोलन

11 जनवरी 1944 को जन्में शिबू सोरेन की लड़ाई तब शुरू हुई जब अविभाजित बिहार यानी आज के झारखंड में महाजनी प्रथा अपने चरम पर थी। और साल 1957 में उनके पिता की हत्या कर दी गई थी। इसके बाद उन्होंने महजनों और सूदखोरों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। 

झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्‍थापना 

वह वर्तमान रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड के नेमरा गांव के रहने वाले थे लेकिन उनकी मुहिम की गूंज ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार तक पहुंचने लगी। इस आंदोलन के शिबू सोरेन ने आदिवासी समाज की मुख्य परेशानी को समझा और उनका समाधान निकालने में जुट गए। इस लड़ाई के चलते उन्‍होने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्‍थापना की। 

झारखंड राज्‍य के लिए लड़ी लड़ाई

बिहार से झारखंड को अलग कर एक आदिवासी राज्‍य बनाने की मांग को धार देते हुए शिबू सोरेन ने लड़ाई की शुरुआती थी। इसी दौरान, शिबू सोरेन ने अपने साथियों के साथ टुंडी, पलमा, तोपचांची, डुमरी, बेरमो, पीरांड में आंदोलन चलाया। इस बीच, महिलाएं हसिया लेकर आती और जमींदारों के खेतों से फसल काटकर ले जाती और खेतों से दूर आदिवासी पुरुष तीर कमान लेकर आते और रखवाली करते।

इसके बाद इलाके में कानून व्यवस्था की स्थिति उत्‍पन्‍न होने के बाद

दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने पारसनाथ के घने जंगल की तरफ रुख किया। यहीं से उन्होंने आंदोलन भी चलाया। उनके आंदोलन का मकसद यही था कि किसी भी तरह आदिवासियों के शोषण को रोका जा सके।

आदिवासियों ने उन्‍हें गुरु का दर्जा दिया

दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने आदिवासियों के लिए हक और उनके शोषण को लेकर जो आवाज उठाई, उससे उनका कद इतना बड़ा हो गया कि हर घर में उन्हें गुरु जी कहने लगे। तब से उन्‍हें झारखंड में दिशोम गुरु के नाम से जानते है। झारखंड को अलग करने की इस लड़ाई में शिबू सोरेन ने एक बड़ी जीत हासिल की। उनकी इस जीत ने आदिवासियों के बीच उन्‍हें एक गुरु का दर्जा दिया। 

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