नई दिल्ली, 29 मार्च (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य से जवाब मांगा, जिसमें शस्त्र अधिनियम के तहत जुम्मा कार्यकाल धारकों और कोडवा समुदाय को आग्नेयास्त्र (फायरआर्म्स) ले जाने और रखने का लाइसेंस प्राप्त करने से छूट की अनुमति दी गई है। कैप्टन चेतन वाई. के. ने याचिका दायर करते हुए 29 अक्टूबर, 2019 को गृह मंत्रालय द्वारा जारी छूट अधिसूचना की वैधता को बरकरार रखने वाले कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी है। अधिसूचना में कहा गया है, वर्ग से किसी भी कुर्ग व्यक्ति और जुम्मा कार्यकाल धारक द्वारा हथियार या गोला-बारूद लाया जाया या रखा गया है और यहां कुर्ग जिले में रहने या बाहर यात्रा करने के दौरान छूट दी गई है, वो एक राइफल के लिए 100 राउंड गोला बारूद के साथ से अधिक और एक स्मूथ बोर ब्रीच या मजल लोडिंग गन में 500 कारतूस से अधिक ना हो या सीसा और बारूद (गनपाउडर) के बराबर हो। प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने दलीलें सुनने के बाद नोटिस जारी किया। दलील में तर्क दिया गया कि अधिसूचना ने जाति और नस्ल और पैतृक भूमि के कार्यकाल के आधार पर भेदभाव पैदा किया, जिसने संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन किया। याचिका में तर्क दिया गया है कि स्थानीय लोगों, जिनकी संस्कृति समान है, लेकिन न तो कुर्ग समुदाय से हैं और न ही उनके पास अब जुम्मा के लिए भूमि पर कब्जा है, उन्हें कोई छूट नहीं दी गई है। इसने तर्क दिया कि अधिसूचना शस्त्र अधिनियम की धारा 41 के तहत जारी की गई थी और इस अधिनियम के तहत कोई भी छूट केवल जनहित में दी जा सकती है, जबकि इस बात पर जोर दिया गया है कि अधिसूचना ने धारा 41 का भी उल्लंघन किया है। उच्च न्यायालय ने पाया कि कोडवा समुदाय और जुम्मा कार्यकाल धारक स्वतंत्रता पूर्व अवधि के बाद से छूट का लाभ उठा रहे हैं और उन्हें दस साल की अवधि के लिए छूट दी गई है, न कि अनिश्चित अवधि के लिए। –आईएएनएस एकेके/एएनएम




