नई दिल्ली/ रफ्तार डेस्क/ बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने तेज और जुनून की वजह से वो जनी जाती है वो कोलकाता के धर्मतला के चौराहे पर जिस सरकार ने पुलिस से कभी लाठियों से मारा था। फिर उसी सरकार को गिराने का काम किया है।आज उसी मुख्यमंत्री संघर्षो की दास्तां को जानेगें।
कोलकाता के एक गरीब घर में पांच जनवरी 1955 को ममता बनर्जी या ममता बंद्योपाध्याय का जन्म हुआ। बांग्ला में बंद्योपाध्याय को ही बनर्जी लिखा, पढ़ा और कहा जाता है। तब भला किसको पता था कि गरीब परिवार में जन्मी यह बच्ची एक दिन इतिहास रचेगी। 34 सालों से बंगाल की सत्ता पर काबिज वाम दलों को बाहर का रास्ता दिखा देगी। पर ऐसा हुआ, जिसके लिए ममता बनर्जी को काफी संघर्ष करना पड़ा तो तकलीफें भी खूब झेलीं थी। अब तक की यात्रा आसान नहीं रही।
ममता बनर्जी 17 साल की थीं, तभी उनके पिता जी का निधन हो गया था। घर की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उनको ढंग से इलाज भी नहीं मिल पाया था। ऐसे में घर की जिम्मेदारी ममता के कंधों पर आ गई तो उन्होंने बूथ पर दूध तक बेचा पर हार नहीं मानी। दीदी के नाम से विख्यात ममता ने कलकत्ता के योगमाया देवी कॉलेज से स्नातक की शिक्षा ली। इसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से इस्लामिक इतिहास में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। फिर योगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री भी हासिल की है।
सबसे कम उम्र की सांसद बनीं
काफी कम उम्र में ममता की रुचि राजनीति में हुई तो कांग्रेस पार्टी से जुड़ गईं। पहले महिला कांग्रेस और फिर अखिल भारतीय युवा कांग्रेस की महासचिव बनाई गईं। 1975 में उनको पश्चिम बंगाल में इंदिरा कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। 1978 में वह कलकत्ता दक्षिण जिला कांग्रेस कमेटी की सचिव चुनी गई 1984 में ममता पहली बार कलकत्ता दक्षिण सीट से जीत कर लोकसभा पहुंचीं। तब आठवीं लोकसभा में वह देश की सबसे उम्र की सांसद थीं।
वर्ष 1991 में ममता दोबारा सांसद बनीं तो उन्हें केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद ममता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1996 में फिर लोकसभा पहुंचीं, हालांकि, 1997 में कांग्रेस से उनकी राह जुदा हो गई और उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के नाम से अपनी नई पार्टी बना ली, जो आज बंगाल में सरकार चला रही है।
एक हमले में हुई थी घायल
ममता बनर्जी का राजनीति में आने का एक ही लक्ष्य था, कई दशकों से बंगाल की सत्ता पर काबिज वाम दलों को उखाड़ फेंकना। इसके लिए संघर्ष के दौरान साल 16 अगस्त 1990 को उन पर जानलेवा हमला हुआ, जिसके कारण एक महीने तक अस्पताल में रहना पड़ा। साल 1993 में ममता बनर्जी ने फोटो युक्त वोटर आईडी की मांग कर दी और कोलकाता में स्थित बंगाल सरकार के सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग की ओर मोर्चा निकाल रही थी। तभी पुलिस से झड़प हो गई। पुलिस ने गोलीबारी कर दी, जिसमें ममता के साथ संघर्ष कर रहे 14 लोगों की मौत हो गई थी। खुद ममता बनर्जी बुरी तरह से घायल हुई थीं। फिर भी हार नहीं मानी।





