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Monday, March 16, 2026
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प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की वैधता को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट में आज होगी सुनवाई

उत्तर प्रदेश में संभल की जामा मस्जिद सर्वे को लेकर हुए हिंसा के बाद देश के अंदर ऐसे कई धार्मिक स्‍थल विवादों के घेरे में आ गए है।

नई दिल्‍ली, रफ्तार डेस्‍क। उत्तर प्रदेश में संभल की जामा मस्जिद सर्वे को लेकर हुए हिंसा के बाद देश के अंदर ऐसे कई धार्मिक स्‍थल विवादों के घेरे में आ गए है। इस पूजा स्‍थल को लेकर बने कानून प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 के अधिनियक की वैधानिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस अधिनियम में किए गए प्रावधान का पालन न किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई जा रही है और इसे चुनौती मानते हुए सुप्रीम कोर्ट में 6 याचिकाएं दाखिल की गई हैं। कानून की वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) संजीव खन्ना की अगुवाई वाली पीठ इस पर सुनवाई करेगी।

संभल, अजमेर और दिल्‍ली की जामा मस्जिद को लेकर किए गए दावे के बाद जमीअत उलमा ए हिंद ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा था और धार्मिक स्‍थल अधिनियम 1991 पर जल्‍द फैसला सुनाने के लिए अनुरोध किया गया था। यह पत्र संभल की शाही जामा मस्जिद में निचली अदालत ने सर्वे कराने के आदेश देने के बाद से लिखा गया था। 

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 के प्रावधानों को आधान मानते हुए इसे चुनौती देने वाली याचिकाओं पर शीर्ष अदालत आज यानी गुरुवार को अपना फैसला देगा, वहीं चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) संजीव खन्ना, जस्टिस पीवी संजय कुमार और जस्टिस मनमोहन की तीन जजों की पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी।

कुल छह याचिकाएं दाखिल

देश में धार्मिक स्‍थल को लेकर सियासी गरमाई हुइ है। और इस मामले में अब तक कुछ छह याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दर्ज कराया गया है। इनमें से कुछ याचिकाओं में धार्मिक कानून की मान्‍यता को समाप्‍त करने की मांग की गई है। इस केस के याचिकाकर्ताओं में विश्वभद्र पुजारी पुरोहित महासंघ, डॉक्टर सुब्रह्मण्यन स्वामी और अश्विनी उपाध्याय शामिल हैं, वहीं, जमीअत उलमा ए हिंद ने इसके समर्थन में याचिका दाखिल की है। 

जमीअत उलमा ए हिंद ने हाल ही में देश की शीर्ष अदालत को पत्र लिखकर इस केस पर जल्द से जल्‍द फैसला सुनाने का आग्रह किया था। यह पत्र संभल की शाही जामा मस्जिद में सर्वे के आदेश देने के बाद लिखा गया था। 

क्या है प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991?

पूजा-धार्मिक स्थल अधिनियम 1991 कानून में यह कहा गया है कि, 15 अगस्त 1947 के बाद में अस्तित्व में आए ऐसे धार्मिक स्थलों की स्थिति को यथावत बरकरार रखना जाएगा, उसे किसी भी प्रयास से बदला नहीं जा सकता। यह कानून देश में उपासना स्थल का धार्मिक ढांचे को नया रुप देने से रोकता है। हालांकि, इस कानून को अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर लागू नहीं होता है। इसे इस विवाद से बाहर रखा गया है। 

सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई

इस मामले में दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को एक साथ सुनवाई करेगा। यह सुनवाई देश के धार्मिक विवादों में समाधान की संजीवनी मानी जा रही है, और देश में लंबे अरसे से चली आ रही धार्मिक लड़ाई और सांप्रदायिक तनाव तथा धर्मनिरपेक्ष ढांचे के भविष्य पर भी गहरा प्रभाव डाल सकती है।

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