बाड़मेर, 05 जून (हि.स.)। बीएसएफ ने मानसून की बारिश में चार लाख पौधे लगा बॉर्डर और बॉर्डर से लगते गांवों को हरा-भरा करने का लक्ष्य रखा है। इसकी शुरुआत शनिवार को विश्व पर्यावरण दिवस पर बीएसएफ हेडक्वार्टर पर 300 पौधे लगाकर की गई। भारत-पाक सीमा पर व सीमा से लगते गांवों में सीड्स बॉल व मटका पद्धति से तीन लाख पौधे लगाने की तैयारी की जा रही है। सीमा सुरक्षा बल ने जिला मुख्यालय सेक्टर हेड क्वार्टर पर विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर पौधरोपण कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें बीएसएफ डीआईजी विनीत कुमार ने पौधरोपण कर इस कार्यक्रम की शुरुआत की। सेक्टर हेडक्वार्टर में बीएसएफ जवानों व अधिकारियों ने 300 अलग-अलग किस्म के पौधे लगाकर उनके बड़े होने तक देखभाल करने का संकल्प किया है। बीएसएफ के डीआईजी विनीत कुमार ने बताया कि बीएसएफ ने बीड़ा उठाया है कि इस रेगिस्तानी इलाके में पौधे लगाकर जमीन को हम हरा-भरा करेंगे। बीएसएफ का एक लाख और पौधे लगाने की योजना है। इसके लिए बीएसएफ वन विभाग के संपर्क में है। भारत-पाक सीमा पर तैनात बीएसएफ की सभी बटालियंस में नर्सरी बनाई गई है, जिनमें सीड्स बॉल बना कर तीन लाख पौधे तैयार किए जाएंगे। पौधे तैयार होते ही बारिश के मौसम में तीन लाख पौधे सरहद सहित सीमावर्ती गांवों में लगाए जाएंगे। पौधरोपण के दौरान जहां पानी की कमी है वहां बीएसएफ पानी पहुंचा कर इनको मटका पद्धति से सींचकर पौधों को बड़ा करने की योजना पर काम कर रही है। बीएसएफ की बटालियन नर्सरियों में नीम, शरेष, गूगल, कनेर, मीठी नीम सहित सैकड़ों पौधे तैयार किए जा रहे है। आयुर्वेदिक नर्सरी में एलोवेरा, गूगल, नींबू, सदाबहार, नागफनी, तुलसी, मेहंदी, धतूरा, कैर, इमली, अमरूद सहित विभिन्न औषधीय पौधे लगाए गए हैं। क्या है सीड्स बॉल व मटका पद्धति मरुस्थल में पौधे लगाने के लिए सीड्स बॉल व मटका पद्धति सबसे कारगर है। यहां नमी व पानी की कमी होने की वजह से थोड़े पानी से अधिक पौधे पनपाने के लिए यह विधि अपनाई जाती है। सीड्स बॉल में गीले गोबर में स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल बीजों को रखकर गोबर की बॉल बना दी जाती है। इसके बाद यह सूख जाती है लेकिन इसमें कई दिनों तक नमी रहती है। इन बॉल्स को मरुस्थल में मानसून आने के दौरान जमीन में कुछ इंच नीचे गाड़ दिया जाता है। इसके बाद पौधे अपने आप अंकुरित होने लगते हैं। पानी की कमी को देखते हुए पौधे लगाने के दौरान उसके पास मटकी के तल में छेद कर जमीन में गाड़ दी जाती है। इसके बाद इसमें पानी भर दिया जाता है। एक मटकी भरने के बाद पंद्रह दिन तक उस पौधे को नियमित पानी मिलता रहता है। हिन्दुस्थान समाचार/रोहित/ ईश्वर




