नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। 14 अप्रैल 2025 को आज भारतीय संविधान के जनक माने जाने वाले डॉ बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर की जयंती मनाई जा रही है। डॉ आंबेडकर का नाम उन महापुरुषों में लिया जाता है जिन्होंने अपने अहम प्रयासों से इस देश को एक अहम संविधान सौंप दिया। इसके अलावा डॉ आंबेडकर ने निचले तबके को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए भ्रसक प्रयास किया। वह समाज से वर्ण व्यवस्था खत्म करना चाहते थे। उन्होंने अपने जीवन के आखिरी कालखंड में हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था।
जाति प्रथा के खिलाफ थे आंबेडकर
डॉ. भीमराव आंबेडकर अपने बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के रहे थे। वह समाज में तत्कालीन असमानता के खिलाफ हमेशा अपनी आवाज मुखर रखा करते थे। उन्होंने भी अपने बचपन में जाति प्रथा का दंश झेला था। इस बात से वह इतने दुखी हुए कि उन्होंने हिंदू धर्म छोड़ने का ऐलान कर दिया। उन्होंने 13 अक्टूबर 1935 को एक घोषणा की और कहा कि मुझे वह धर्म पसंद है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाता है, क्योंकि एक व्यक्ति के विकास के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है जो करुणा, समानता और स्वतंत्रता है। 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने अपने 3.65 लाख अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म से अपना संबंध तोड़ दिया और वह बौद्ध धर्म में शामिल हो गए।
मैं हिंदू धर्म में जन्मा हूं लेकिन मरूंगा नहीं- डॉ. आंबेडकर
डॉ. आंबेडकर ने समाज में से वर्ण व्यवस्था खत्म करने के लिए समाजिक स्तर पर तो काफी प्रयास किए ही हैं साथ ही कानूनी लड़ाई भी लड़ी। हालांकि उन्हें इसमें कुछ सफलता नहीं मिला। सारी कोशिशें नाकाम रही। इसके बाद उन्होंने धर्म परिवर्तन करने का फैसला लिया। उनके शब्द थे कि “मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ हूं, लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं, कम से कम यह तो मेरे वश में है” उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाते हुए कहा था कि बौद्ध धर्म प्रज्ञा, करुणा प्रदान करता है और समता का संदेश देता है।




