नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। आज से भारत में पुराने आपराधिक कानून IPC की जगह नए कानून लागू हो गए। इसकी वजह से देश की न्याय व्यवस्था बदल जाएगी। दरअसल सोमवार से भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम अंग्रेजों के जमाने की भारतीय दंड संहिता 1860, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की जगह ले चुके हैं। हालांकि कई गैर-बीजेपी शासित राज्यों ने इस कानून का भी विरोध किया है।
शादी का वादा करके धोखा देने पर 10 साल की होगी सजा
इस नए भारतीय न्याय संहिता में नए अपराधों को शामिल किया गया है। जैसे-शादी का वादा कर धोखा देने में अब 10 साल की सजा होगी। नस्ल, जाति-समुदाय और लिंग के आधार पर मॉब लिंचिग के मामले में आजीवन कारावास और छिनैती के लिए 3 साल तक की सजा होगी। इसके अलावा UAPA जैसे आतंकवाद-रोधी कानूनों को भी इस कानून में शामिल किया गया है।
क्या-क्या नया जोड़ा गया है?
– FIR, जांच और सुनवाई के लिए अनिवार्य समय सीमा तय की गई है। अब लोगों को तारीख पर तारीख नहीं मिलने वाली है। अब सुनवाई के 45 दिनों के भीतर फैसला देना होगा। यहीं नहीं शिकायत के 3 दिन के भीतर FIR दर्ज करनी होगी।
– एफआईआर अराध और अपराधी ट्रैकिंग सिस्टम के माध्यम से दर्ज की जाएगी। ये प्रोग्राम NCRB के तहत काम करता है। अब लोग बिना पुलिस स्टेशन गए ऑनलाइन ही E-FIR दर्ज करा सकेंगे। इसके अलावा जीरो एफआईआर किसी भी पुलिस स्टेशन में दर्ज कराया जा सकता है चाहे वो अपराध उस पुलिस थाना के अधिकार क्षेत्र में आता हो या नहीं।
– पहले केवल 15 दिनों की पुलिस रिमांड दी जा सकती थी। लेकिन अब पुलिस 60 या 90 दिनों तक रिमांड ले सकती है। कानून के जानकारों को इसको लेकर चिंतायें हैं। उनका कहना है कि केस का ट्रायल शुरू होने से पहले इतनी लंबी पुलिस रिमांड कहीं से सही नहीं है।
– भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाली हरकतों को एक नये अपराध की श्रेणी में डाला गया है। वहीं राजद्रोह को हटा दिया गया है। इसके जगह पर एक नया प्रावधान जोड़ा गया है।
– शादी का झूठा वादा करके सेक्स को विशेष रूप से अपराध के रूप में पेश किया गया है। इसके लिए 10 साल तक की सजा हो सकती है। इसके अलावा पूर्व विवाहित होते हुए भी इस तथ्य को छिपाकर दूसरा विवाह करना भी अब जघन्य अपराध की श्रेणी में आएगा। जिसको लेकर 10 साल जेल और जुर्माने का प्रावधान है।
– इसके अलावा जांच पड़ताल में अब फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाना अनिवार्य बन गया है। सूचना प्रौद्योगिकी का अधिक उपयोग, जैसे खोज और बरामदगी की रिकॉर्डिंग, सबी पूछताछ और सुनवाई ऑनलाइन मोड में करना।
– इसके अलावा अब सिर्फ मौत की सजा पाये दोषी ही दया याचिका दाखिल कर सकते हैं। पहले कोई भी एनजीओ या सिविल सोसाइटी ग्रुप भी दोषियों की तरफ से दया याचिका दायर कर देते थे।
अन्य खबरों के लिए क्लिक करें:- www.raftaar.in





