नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। सुप्रीम कोर्ट में अभद्रता करने वाले वकील राकेश किशोर पर अब कड़ी कानूनी कार्रवाई तय मानी जा रही है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) भूषण रामकृष्ण गवई की ओर जूता फेंकने की घटना को लेकर उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना का मुकदमा चलाया जाएगा। इस संबंध में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमनी ने सहमति दे दी है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई दीवाली की छुट्टियों के बाद तय की है।
गुरुवार को यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष रखा गया। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष वरिष्ठ वकील विकास सिंह और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता बेंच के सामने उपस्थित हुए। उन्होंने अदालत को सूचित किया कि अटॉर्नी जनरल ने कार्रवाई के लिए अपनी सहमति प्रदान कर दी है।
बेंच ने उठाया सवाल, क्या आगे बढ़ाना जरूरी?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने टिप्पणी की कि चीफ जस्टिस ने स्वयं उदारता दिखाते हुए इस मामले में कोई कार्रवाई न करने की बात कही थी। यह दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट की गरिमा इस घटना से प्रभावित नहीं हुई।
हालांकि, इस पर वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने तर्क दिया कि जिस तरह से सोशल मीडिया पर इस घटना को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है, उससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंच रही है। साथ ही, आरोपी वकील राकेश किशोर ने अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं दिखाया है, बल्कि गर्व का भाव व्यक्त किया है। ऐसी स्थिति में चुप रहना न्याय व्यवस्था के सम्मान के विपरीत होगा।
क्या है पूरा मामला?
घटना 6 अक्टूबर 2025 की है। सुबह लगभग 11:35 बजे सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर 1 में सुनवाई के दौरान वकील राकेश किशोर ने अपना जूता निकालकर CJI गवई की ओर फेंक दिया था। मौके पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें तुरंत हिरासत में ले लिया। बाद में कोर्ट रजिस्ट्री की ओर से कोई औपचारिक शिकायत दर्ज न होने पर दिल्ली पुलिस ने उन्हें रिहा कर दिया।
हालांकि, इस शर्मनाक हरकत के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने राकेश किशोर के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उन्हें वकालत से निलंबित कर दिया है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी उनकी सदस्यता रद्द कर दी है।
विकास सिंह का बयान
SCBA अध्यक्ष विकास सिंह ने कहा कि, यह सिर्फ एक व्यक्ति का कृत्य नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र की गरिमा पर हमला है। जब आरोपी वकील को अपने किए पर कोई अफसोस नहीं है, तब कार्रवाई जरूरी है ताकि अदालत का सम्मान कायम रहे।





