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Tuesday, March 17, 2026
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25 साल की उम्र में अंग्रेजो के खिलाफ कर बैठे ‘काकोरी कांड’, क्यों फांसी की सजा मिलने पर खुद को खुशनसीब बताया?

अशफाकउल्ला खान उन क्रांतिकारियों में से हैं जिन्होंने देश के लिए हंसते हुए अपनी जान की कुर्बानी दे दी। शहीद होते हुए कह गए कि मुसलमानों में अकेला मैं ही खुशनसीब हूं जिसको देश के लिए फांसी दी जाएगी।

नई दिल्ली, रफ्तार न्यूज। ‘मेरे देश की थोड़ी सी धूल मेरे कफन में रख देना’ यह लिखने वाले क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खां महज 27 साल की उम्र में जान की कुर्बानी दे गए। यह शख्सियत अपना उप नाम ‘हसरत’ बताया करते थे। आज अशफाक उल्ला खां की जयंती पर हम उनके बारे में आपको बताएंगे। 

स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ कविताएं लिखा करते थे

यह कहानी तब की है जब भारत अंग्रेजो का गुलाम था और भारत की रग-रग में क्रांति के साथ आजादी का खून दौड़ रहा था। उन्ही क्रांतिकारियों में से एक अशफाक उल्ला खां थे। अशफाक का जन्म 22 अक्टूबर 1900 में हुआ। अशफाक के पिता एक पठान परिवार से ताल्लुक रखते थे। परिवार के सभी लोग नौकरी में थे मगर खान बचपन से ही देश प्रेमी थे और देश के लिए कुछ कर रखने का जुनून रखते थे। अशफाक स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ साथ कविता भी लिखते थे। कविता के साथ-साथ उन्हें घुड़सवारी, निशानेबाजी और तैराकी का भी शौक था। उन्होंने काफी कविताएं लिखी हैं। वो अपनी कविताएं में अपने उपनाम हसरत का इस्तमाल करते थे। 

गांधी जी का असर शुरु से ही था

अशफाक का बचपन से ही पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लगता था। वो बचपन से देश के लिए किए जाने वाले आन्दोलनों की कहानियों में रुचि रखते थे और उन्हें पढ़ते थे। गांधी जी का प्रभाव भी उनपर था। जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया तो उनको दुख हुआ था।  

काकोरी कांड में योगदान 

अशफाक का नाम उन क्रांतिकारियों में गिना जाता है जिन्होंने देश की आजादी में हंसते-हंसते अपनी जान की कुर्बानी दे दी थी। 25 साल की उम्र में अशफाक उल्ला खां ने अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार के नाक के नीचे से खजाना लूट लिया था। जिसके बाद ब्रिटिश सरकार मानों बौखला सी गई थी। आपको बता दें कि इस घटना को ‘काकोरी कांड’ के नाम से जाना जाता है। 

काकोरी कांड की पूरी कहानी 

काकोरी कांड को अंजाम देने के लिए शाहजहांपुर में 8 अगस्त 1925 को एक बैठक हुई जिसमें काकोरी कांड को अंजाम देने के लिए प्लान बनाया। इसमें अशफाक के अलावा चन्द्रशेखर आज़ाद, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, सचिन्द्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाला, मुकुन्द लाल और मन्मथ लाल गुप्ता शामिल थे। इन सभी क्रांतिकारियों ने ट्रेन से खजाना लूटने को अंजाम दिया। 9 अगस्त 1925 को इन सभी क्रांतिकारीयों ने साथ मिलकर लखनऊ के पास काकोरी में रेलगाड़ी में ब्रिटिश सरकार का खजाना जा रहा था जिसको लूट लिया था। 

क्यों लूटा गया खजाना? 

अशफाक और उनके क्रांतिकारी साथी जिस धन को लूटना चाहते थे उस धन को अंग्रेजो ने भारतीयों से हड़पा था। इस घटना को अंजाम देने से पहले सभी क्रांतिकारियों ने अपना नाम भी बदल लिया था। अशफाक उल्ला खां ने अपना नाम बदलकर ‘कुमारजी’ रखा लिया था।  

27 साल की उम्र में हुए शहीद 

26 सितंबर 1925 को हिंदुस्तान रिपब्लिकन के कुल 40 क्रांतिकारीयों को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया था। बिस्मिल खान, राजेन्द्री लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई। बाकी 16 क्रांतिकारियों को कम से कम चार साल की सजा सुनाई गई। इसके अलावा क्रांतिकारियों को काला पानी यानी कि आजीवन कारावास की सजा दी गई थी। अशफाक उल्ला खां को फैजाबाद कारावास में रखा गया। इस दौरान अशफाक ने कुरान और नमाज पढ़ा। मात्र 27 साल की उम्र में अशफाक उल्ला खां शहीद हो गए थे। 

“मुसलमानों में अकेला मैं ही खुशनसीब हूं जो क्रान्तिकारी बनकर फांसी पर चढ़ेगा”

शहिद होते अपने परिवार को कह गए कि मुसलमानों में अकेला मैं ही ऐसा खुशनसीब हूं जोइस केस में क्रान्तिकारी बनकर फांसी चढूंगा। इसके अलावा जब वकील कृपाशंकर हजेला के साथ उनके भाई यासतउल्ला खां और चाचा शहंशाह खां जेल में उनसे मिलने आए थे तब अशफाक ने उनसे कहा था कि आपको खुशी मनानी चाहिए कि इनका भाई देश के लिए जान कुर्बान करते हुए फांसी पर चढ़ रहा है। उस वक्त उनके चाचा और भाई की आखों में आंसू थे।  

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