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Monday, March 2, 2026
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जाति की राजनीति में फंसे अखिलेश यादव, बीजेपी का पोस्टर से पलटवार, जाने पूरा मामला?

2017 में यूपी की सत्ता से बेदखल होने के बाद से ही समाजवादी पार्टी के मुखिया अलग-अलग गठबंधन और नए-नए प्रयोग करते दिख रहे हैं।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव जिसने 2017 में यूपी की सत्ता से बेदखल होने के बाद से ही अलग-अलग गठबंधन और नए-नए प्रयोग किए जिसमें 2017 में मिली हार के बाद उन्होंने ठाकुर बनाम ब्राह्मण का प्रयोग किया था। हालांकि, इसका कोई विशेष फायदा न तो उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में मिला और ना ही 2022 के विधानसभा चुनाव में। 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए फॉर्मूले पर 37 सीट जीतने के बाद अब अखिलेश यादव नया प्रयोग करने में जुटे है। जिसपर अब उनके इस दावं का पलटवार करते हुए पोस्टर जारी कर दिया है। जाने पूरा मामला?

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने इटावा कथावाचक बदसलूकी मामले को सियासी रंग देते हुए उसे यादव बनाम ब्राह्मण तो बना दिया है, लेकिन वे दुविधा में भी फंस गए हैं। उन्हें डर है कि कहीं ब्राह्मण वोटर अब उनसे न छिटक जाए। इस बार वे ‘दलित बनाम ठाकुर’ अब इटावा कथावाचक के साथ बदसलूकी मामले को यादव बनाम ब्राह्मण का रंग देते नजर आ रहे है। जिसके बाद बीजेपी को भी उनपर हमला बोलने का मौका मिल गया है । जहां वे उन पर जाति की राजनीति का आरोप लगा रही है। 

गौरतलब है कि, इस प्रयोग में भी अखिलेश यादव की दुविधा साफ नजर आ रही हैं, क्योंकि वे PDA में A का मतलब अल्पसंख्यक भी बताते हैं और फिर अगड़ा भी बता देते हैं। यानी कि वे ठाकुर और ब्राह्मणों का वोट लेना भी चाहते है और अगर वे यादव-ब्राह्मण विवाद में ब्राह्मणों का पक्ष लेते हैं तो उनका एक वोटर यादव का हिस्सा नाराज हो जाएगा। यही वजह रही कि, इस बार उनके 52वें जन्मदिन पर लगे एक पोस्टर में लिखा गया कि, हम जातिवादी नहीं, PDA वादी हैं। 

बीजेपी का भी पोस्टर से पलटवार

लखनऊ में भी बीजेपी युवा मोर्चा के महामंत्री अमित त्रिपाठी ने पोस्टर लगवाए जिसमें सपा मुखिया पर गंभीर आरोप लगाते हुए लिखा गया है कि ‘दलितों से लाभ लेने वाले, ब्राह्मणों के नाम पर वोट लेने वाले, पिछड़ों को सिर्फ वोट बैंक समझने वाले गुंडे और बदमाशों की फौज के मुखिया माफियाओं का हर सुख-दुख में साथ देने वाले यूपी को आपराधिक प्रदेश में बदलने वाले श्री अखिलेश यादव जी को जन्मदिवस की ढेरों शुभकामनाएं।

क्या है अखिलेश की चुनौती?

इससे पहले बात करे तो, पहले राणा सांगा विवाद पर और सपा सांसद रामजीलाल सुमन के घर करणी सेना के हमले मामले में भी अखिलेश यादव ने दलित बनाम ठाकुर का हवाला देते हुए वे अपने सांसद के साथ मजबूती से खड़े रहे। उनके इस कदम से जहां ठाकुर समाज में अखिलेश के खिलाफ जबरदस्त नाराजगी देखने को मिली तो वहीं अब इटावा में यादव कथावाचक के साथ बदसलूकी मामले में समाजवादी पार्टी अपने कोर वोटर्स के साथ है। अब अखिलेश के लिए चुनौती यह है कि, भले ही वह अपने यादव वोट बैंक के साथ हों, पर बीजेपी इसे वर्णन करने की कोशिश कर रही है कि नॉन ओबीसी और सवर्ण वर्ग को समाजवादी पार्टी ध्यान नही देती। जो उनके लिए आनेवाले 2027 में चुनाव में बड़ा चैलेंज हो सक‍ता है। 

बीजेपी के लिए एडवांटेज कैसे?

अखिलेश यादव की यह दुविधा बीजेपी के लिए फ़ायदा साबित होती दिखाई दे रही है। क्योंकि, साल 2017 के चुनाव में भी पार्टी ने समाजवादी पार्टी को मुस्लिम और यादवों पर ध्‍यान ना देने का आरोप लगाकर नॉन ओबीसी और सवर्ण वर्ग को अपने पाले में कर लिया था। ऐसी ही स्थिति 2022 में भी रही, जो एक‍ बार फिर उनके हिस्सें से ये मौका भी गवांते दिखाई देते नजर आ रहे है। जिसे एक बार फिर भाजपा अखिलेश यादव को ब्राहम्ण और नॉन ओबीसी का विरोधी बताकर अपना नया सियासी दांव खेलने में लगी हुई है।

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