नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर ठाकरे परिवार चर्चा के केंद्र में है। लंबे अरसे से अलग राह चल रहे दो भाई, राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे अब लगातार मुलाकातों से सुर्खियां बटोर रहे हैं। रविवार को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे अपने परिवार के साथ मातोश्री पहुंचे, जहां उन्होंने शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और परिवार के साथ करीब तीन घंटे तक स्नेहभोज और चर्चा की।
यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों की घोषणा कभी भी हो सकती है, और सियासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। राजनीतिक हलकों में अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या राज ठाकरे एक बार फिर भाई उद्धव के साथ आएंगे या भाजपा के साथ अपने पुराने समीकरण को दोहराएंगे?
पारिवारिक मुलाकात या राजनीतिक संकेत?
राज ठाकरे ने मुलाकात के बाद मीडिया से कहा कि यह सिर्फ पारिवारिक स्नेहभोज था। उन्होंने कहा, मां मेरे साथ थीं, इसलिए मातोश्री गया था। राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस बयान को लेकर संशय बना हुआ है। वजह यह है कि पिछले दो महीनों में दोनों भाइयों की यह छठी मुलाकात है और हर बार इन बैठकों के बाद नई अटकलें तेज हुई हैं।
सूत्रों के मुताबिक, मातोश्री में हुई इस बैठक में मुंबई, ठाणे और पुणे नगर निगम चुनावों को लेकर भी चर्चा हुई। बताया जा रहा है कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) चाहती है कि मनसे और यूबीटी मिलकर स्थानीय निकाय चुनाव लड़ें, ताकि भाजपा और शिंदे गुट को कड़ी टक्कर दी जा सके।
पिछले दो महीनों में दोनों भाइयों की यह छठी मुलाकात बताई जा रही है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राज ठाकरे अपने बेटे अमित ठाकरे की हार के लिए एकनाथ शिंदे गुट को जिम्मेदार मानते हैं, जबकि भाजपा से उनकी रिश्तेदारी अब पहले जैसी तल्ख नहीं रही है।
राज ठाकरे की रणनीति क्या है?
राज ठाकरे का राजनीतिक सफर हमेशा से दिलचस्प रहा है। 2006 में शिवसेना छोड़ने के बाद उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई थी। उनके भाषणों और आक्रामक रैलियों ने उन्हें लोकप्रिय बनाया, लेकिन वक्त के साथ उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर पड़ी।
2019 के लोकसभा चुनाव में राज ठाकरे ने भाजपा विरोधी रुख अपनाते हुए विपक्षी दलों के पक्ष में अभियान चलाया, लेकिन उसी साल के विधानसभा चुनाव में मनसे अकेले उतरी और खास प्रदर्शन नहीं कर पाई।
इसके बाद राज ठाकरे ने धीरे-धीरे भाजपा से दूरी घटाई, और 2022 में हिंदुत्व के मुद्दों पर एक बार फिर सक्रिय हुए — जिससे उन्हें शिंदे गुट से टकराव की स्थिति में ला खड़ा किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज ठाकरे अब अपने लिए नई जमीन तलाश रहे हैं। एक तरफ वे उद्धव के साथ परिवारिक समीकरण सुधार रहे हैं, तो दूसरी ओर भाजपा से भी पूरी तरह दूरी नहीं बना रहे हैं।
क्या बन सकता है नया ‘ठाकरे गठबंधन’?
शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राऊत ने दावा किया है कि राज्य की पांच नगरपालिकाओं मुंबई, ठाणे, पुणे, नासिक और नागपुर में यूबीटी और मनसे के बीच समझौता लगभग तय हो चुका है। संजयराऊत ने कहा, बालासाहेब ठाकरे का नाम और विचारधारा दोनों को साथ लाना वक्त की जरूरत है। अगर ठाकरे परिवार साथ आता है, तो यह हिंदुत्व की मूल धारा को नई ताकत देगा। हालांकि,मनसे ने आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, राज ठाकरे किसी औपचारिक गठबंधन से पहले राजनीतिक परिस्थितियों को परखना चाहते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषक दयानंद नेने का कहना है कि अगर उद्धव और राज ठाकरे साथ आते हैं, तो यह ठाकरे परिवार की विरासत की अग्निपरीक्षा होगी। उनके अनुसार, दोनों का वोट बैंक लगभग एक ही इलाकों में हैमुंबई, ठाणे, कल्याण और पुणे। इस कारण गठबंधन से शक्ति बढ़ेगी, पर उम्मीदवार चयन और नेतृत्व तय करना चुनौतीपूर्ण रहेगा। नेने यह भी मानते हैं कि अगर मनसे-यूबीटी साथ आए, तो इसका असर महाविकास आघाड़ी (MVA) के समीकरणों पर भी पड़ेगा, क्योंकि कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार गुट) को इस नई जोड़ी में अपने हित साधने होंगे।
भाई-भाई की मुलाकात से गरमाई सियासत
राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच पिछले वर्षों में संवाद लगभग खत्म हो गया था। अब लगातार होती मुलाकातों से यह संकेत जरूर मिल रहा है कि दोनों भाई व्यक्तिगत रिश्तों की बर्फ पिघलाने में सफल हुए हैं।
राज ठाकरे अपने बेटे अमित ठाकरे की 2024 विधानसभा हार से नाराज़ बताए जाते हैं और इसके लिए वे एकनाथ शिंदे गुट को जिम्मेदार मानते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह नाराजगी उन्हें भाजपा की बजाय उद्धव ठाकरे के करीब ला सकती है।
गठबंधन की सुगबुगाहट तेज
शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राऊत ने दावा किया है कि राज्य की पांच नगरपालिकाओं में दोनों दलों के साथ आने की लगभग सहमति बन चुकी है। यदि यह गठबंधन साकार होता है, तो यह बीजेपी और शिंदे गुट दोनों के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषक दयानंद नेने कहते हैं, अगर उद्धव और राज ठाकरे साथ आते हैं, तो ठाकरे परिवार की विरासत की यह सबसे बड़ी परीक्षा होगी। दोनों का वोट बैंक एक ही इलाके में है, इसलिए तालमेल आसान नहीं होगा, लेकिन असर बड़ा होगा। उनके अनुसार, मुंबई के 227 वार्डों में अगर शिवसेना (यूबीटी) और मनसे ने हाथ मिलाया, तो इसका सीधा असर महाविकास आघाड़ी (MVA) की रणनीति पर भी पड़ेगा।
राज ठाकरे किस ओर झुकेंगे?
2019 के लोकसभा चुनाव में राज ठाकरे भाजपा के सहयोगी के तौर पर दिखे थे, लेकिन विधानसभा चुनाव उन्होंने अकेले लड़ा। अब लगातार बढ़ती मुलाकातों ने इस सवाल को और मजबूत कर दिया हैक्या राज ठाकरे भाई के साथ खड़े होंगे या भाजपा।
अब सबकी निगाहें आने वाले चुनावों पर
मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव, जिसे “एशिया की सबसे अमीर नगरपालिका” कहा जाता है, आने वाले महीनों में महाराष्ट्र की सियासत की दिशा तय करेगा।अगर उद्धव और राज ठाकरे साथ आते हैं, तो यह चुनाव सिर्फ नगर निकाय की नहीं, बल्कि ‘ठाकरे विरासत बनाम सत्ता गठबंधन’ की लड़ाई बन जाएगा।राज ठाकरे किस ओर झुकेंगे,परिवार की एकजुटता या भाजपा के साथ रणनीतिक समीकरण यही आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल होगा।





