नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। वायु प्रदूषण की बढ़ती समस्या और जलवायु परिवर्तन के कारण प्रकृति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसकी वजह से 2050 तक करीब 75 फीसदी आबादी सूखे से प्रभावित होगी। यह निष्कर्ष संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (UNCCD) और यूरोपीय आयोग संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा हाल ही में वर्ल्ड ड्रॉट एटलस से निकाला गया है। वर्ल्ड ड्रॉट एटलस में ऊर्जा, कृषि और व्यवसाय पर सूखे के प्रभाव का विस्तार से विवरण दिया गया है, जिसे इटली के CIMA रिसर्च फाउंडेशन, नीदरलैंड विश्वविद्यालय और यूएन यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड ह्यूमन सिक्योरिटी ने तैयार किया है।
दुनिया भर में हर चार में से तीन लोग सूखे से प्रभावित होंगे
ऐसा दावा किया गया है कि 2025 में दुनिया भर में हर चार में से तीन लोग सूखे से प्रभावित होंगे। सूखे के खतरे को देखते हुए सभी देशों को एक साथ आकर विशिष्ट योजनाएँ और सहयोग स्थापित करने की आवश्यकता है। बाढ़ और भूकंप की तुलना में सूखे का प्रभाव धीमा होता है। सूखे से जलविद्युत उत्पादन कम हो जाएगा, जिससे बिजली कटौती और बिजली की कीमतें आसमान छूने की संभावना बढ़ जाएगी। इसके अलावा, जल स्तर घटने और जलमार्ग कम होने से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भी नष्ट हो जाएगा।
सूखा सिर्फ जलवायु संकट नहीं
इसमें बताया गया है कि सूखा सिर्फ जलवायु संकट नहीं है। भूमि और जल के उपयोग और प्रबंधन से संबंधित मानवीय कारकों के कारण उत्पन्न संकट है । मानवीय कारकों में पानी का दुरुपयोग, विभिन्न क्षेत्रों में पानी की कमी, खराब भूमि प्रबंधन और जल संसाधनों का गलत उपयोग इसमें शामिल हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में 25 करोड़ से अधिक लोग कृषि पर निर्भर हैं। सूखे से इसके प्रभावित होने का खतरा सबसे अधिक है। हालांकि इसमें इस सूखे से बचने के लिए सुझाव भी दिए गए हैं। उदाहरण के तौर पर चेन्नई में हर साल 1400 मिमी बारिश होती है। रिपोर्ट में इस बारिश का भंडारण कर सूखे से बचने के उपाय खोजने की अपील की गई है। गौरतलब है कि चेन्नई में वर्षा जल संचयन का एक पायलट प्रोजेक्ट पहले ही शुरू हो चुका है।
सब-सहारा अफ्रीका में भी सूखे की आशंका अधिक
भारत के बाद सब-सहारा अफ्रीका में भी सूखे की आशंका अधिक है। UNCCD विशेषज्ञों ने कहा है कि सूखे से होने वाले नुकसान को कम करने की लड़ाई में डेटा साझा करना महत्वपूर्ण होगा। यूएनसीसीडी के कार्यकारी सचिव इब्राहिम थियाव ने कहा कि समय बहुत कम है। ऐसे में मैं सभी देशों, विशेषकर यूएनसीसीडी देशों से अपील करता हूं कि वे इस एटलस के निष्कर्षों की गंभीरता से समीक्षा करें और एक स्थिर, सुरक्षित और टिकाऊ भविष्य के निर्माण के लिए अपना योगदान दें, इसके लिए जो जरूरी कार्य अपने देशों में पर्यावरण संरक्षण के नजरिए से किए जाने हैं, उन्हें करने में देरी ना करें।





