नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। 2025 का साल जिसे विकास और प्रगति के नाम होना चाहिए था, लेकिन यह साल देश के इतिहास में हादसों का साल बनकर दर्ज हो गया है। साल के पहले दस महीनों में भारत में 8 भीषण भगदड़ की घटनाएं हुई हैं, जिसमें अब तक 129 लोगों की जान जा चुकी है। यह संख्या आज़ादी के 78 साल बाद भी हमारी भीड़ प्रबंधन क्षमता की कमजोरी को उजागर करती है। भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में त्योहार, धार्मिक आयोजन और राजनीतिक रैलियों में भीड़ का जुटना सामान्य है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सुरक्षा और व्यवस्थापन के लिए आज भी कोई ठोस समाधान नहीं निकाला जा सका।
2025 में हुई भगदड़ की घटनाओं का विवरण
9 जनवरी – आंध्र प्रदेश (तिरुमाला हिल्स, वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर)
वैकुंठ द्वार दर्शन के टिकट के लिए लाइन में लगे श्रद्धालुओं के बीच अचानक गेट खुलने से भगदड़ मची। हादसे में 6 लोगों की मौत और कई घायल हुए।
29 जनवरी – प्रयागराज (महाकुंभ)
मौनी अमावस्या पर लाखों श्रद्धालु स्नान के लिए घाट पर पहुंचे। भीड़ नियंत्रण न होने के कारण भगदड़ मची। इस हादसे में 30 लोगों की मौत और 60 लोग घायल हुए।
15 फरवरी – प्रयागराज (नई दिल्ली रेलवे स्टेशन)
कुंभ मेले के लिए लोगों के प्लेटफॉर्म पर इंतजार करते समय अफरातफरी मची। हादसे में 18 लोग मरे, जिनमें 4 बच्चे भी शामिल थे।
3 मई – गोवा (शिरगाओ, लैराई देवी जात्रा मंदिर)
लगभग 70 हजार श्रद्धालुओं के बीच एक भक्त के बिजली का झटका लगने से भगदड़ मची। 6 लोगों की मौत और 70 लोग घायल हुए।
4 जून – बेंगलुरु (IPL जीत का जश्न)
आरसीबी की जीत के जश्न में 3 लाख से अधिक लोग जुट गए। भीड़ नियंत्रण में असफलता के कारण भगदड़ मच गई, जिसमें 11 लोगों की जान गई और 50 से ज्यादा घायल हुए।
27 जुलाई – उत्तराखंड (हरिद्वार, मनसा देवी मंदिर)
सीढ़ियों पर अफवाह फैलने से भगदड़ मची। 9 लोगों की मौत और 30 से अधिक लोग घायल हुए।
27 सितंबर – तमिलनाडु (करूर, विजय की रैली)
रैली में भारी भीड़ जुटी। विजय के देर से आने और भीड़ नियंत्रण न होने से भगदड़ मच गई। 41 लोगों की मौत और 50 से अधिक घायल।
1 नवंबर – आंध्र प्रदेश (वेंकटेश्वर मंदिर, श्रीकाकुलम)
एकादशी के मौके पर भारी भीड़ जमा हुई और भगदड़ मच गई। 9 लोगों की मौत, जिनमें 8 महिलाएं और 1 बच्चा शामिल थे।
इनमें प्रमुख कारण विशेषज्ञों का कहना है कि भगदड़ की घटनाओं में मुख्य कारण हैं:-
- भीड़ प्रबंधन की कमी और अपर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था।
- संकरे रास्ते और अनुचित एंट्री-एग्जिट प्लान।
- आयोजनकर्ताओं और श्रद्धालुओं द्वारा सुरक्षा नियमों की अनदेखी।
- अफवाह फैलने और अचानक हलचल के कारण अफरातफरी
- सोशल मीडिया या मौखिक अफवाहें जानलेवा साबित हो सकती हैं।
- प्रवेश-निकास मार्गों का सही प्रबंधन न होना।
- सुरक्षा और निगरानी की कमी।
- हरिद्वार की घटना इसका जीवंत उदाहरण है।
- सार्वजनिक जगहों पर अनुशासन की कमी।
- छोटी घटनाओं पर भीड़ आसानी से बेकाबू हो जाती है।
गौरतलब है कि, 78 साल बाद भी भारत में भीड़ प्रबंधन का ढांचा अधूरा है। तकनीक, प्रशिक्षण और सख्त नियमों की कमी से हर छोटी घटना भयंकर त्रासदी में बदल सकती है। कैलेंडर और दिन-महीने बदलते जाते हैं, लेकिन हर साल कहीं न कहीं ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। यह न केवल प्रशासन बल्कि आम जनता के लिए भी सख्त चेतावनी है।





