नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। कोलकाता हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पश्चिम बंगाल में 2010 के बाद जारी किए गए 5 लाख से ज्यादा ओबीसी सर्टिफिकेट को रद्द कर दिया है। अब ओबीसी आरक्षण का मामला पूरे देश में एक बड़ी चर्चा का विषय बनता जा रहा है। कोलकाता हाईकोर्ट ने ममता बनर्जी की 2012 में पश्चिम बंगाल में सरकार बनने के बाद 77 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने के लिए बनाए गए कानून को ही अवैध करार दे दिया है।
उनका यह फैसला कानून में तब्दील नहीं हो सका
जिससे राजनीतिक गलियारों में ओबीसी आरक्षण को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। पश्चिम बंगाल में 2010 में वाम मोर्चा सरकार थी, जिन्होंने मनमोहन सिंह के कार्यकाल में गठित सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर राज्य में मुस्लिमों की स्थिति में सुधार के लिए ओबीसी आरक्षण 7 फीसदी से बढ़ाकर 17 फीसदी कर दिया था। जिसमे वाम मोर्चा सरकार ने 53 जातियों को ओबीसी की श्रेणी में डाल दिया था। लेकिन वाम मोर्चा की सरकार के ओबीसी आरक्षण को 7 फीसदी से बढ़ाकर 17 फीसदी करने से 87.1 फीसदी मुस्लिम आबादी आरक्षण के दायरे में आ गई। लेकिन वर्ष 2011 में वाम मोर्चा की सरकार सत्ता बाहर हो जाती है और उनका यह फैसला कानून में तब्दील नहीं हो सका।
ओबीसी आरक्षण को 2 वर्गों में बांटा गया था
वाम मोर्चा सरकार के बाद पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार आती है। ममता बनर्जी की सरकार ओबीसी की इस सूची को बढ़ाकर 77 कर देती है। मतलब 77 जातियों को ओबीसी में जोड़ देती है। ममता की सरकार ने इस सूची में अलग से 35 नई जातियों को जोड़ा था। जिसमे से 33 मुस्लिम समुदाय की जातियां थी। वहीं ममता बनर्जी ने भी पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण को 7 फीसदी से बढ़ाकर 17 फीसदी कर दिया था। जिससे इस कानून के आ जाने से पश्चिम बंगाल में 92 फीसदी मुस्लिम आबादी को ओबीसी आरक्षण का फायदा होने लगा। इसमें सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि ओबीसी आरक्षण को 2 वर्गों में बांटा गया था। जिसमे 10 फीसदी आरक्षण एक वर्ग को दिया गया था। जिसमे ज्यादातर मुस्लिम समुदाय थी। दूसरे वर्ग में 7 फीसदी आरक्षण था, जिसमे हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदाय की जातियां थी।
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