नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। अयोध्या के जीएसटी डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह की पोल खोलने वाले उनके बड़े भाई डॉ. विश्वजीत सिंह को अब लगातार धमकियां मिल रही हैं और उनका परिवार उनसे बातचीत तक बंद कर चुका है। यह मामला तब सुर्खियों में आया जब डॉ. विश्वजीत ने प्रशांत सिंह और उनकी बहन जया सिंह द्वारा फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाने का आरोप लगाते हुए शिकायत की। शिकायत के बाद दोनों अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू हो चुकी है और इसी के बीच प्रशांत सिंह ने इस्तीफा दे दिया, जिससे पूरा मामला और गरमा गया है।
”किसी असली दिव्यांग का हक नहीं जाने दूंगा”
डॉ. विश्वजीत का कहना है कि उन्होंने अपने भाई की सच्चाई दुनिया के सामने लाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी दबाव में नहीं झुकेंगे। वे कहते हैं, जो करना है कर लें, लेकिन मैं किसी असली दिव्यांग का हक नहीं जाने दूंगा। यह मेरी नैतिक जिम्मेदारी है। इस दौरान उन्होंने यह भी बताया कि शिकायत के बाद से न सिर्फ प्रशांत, बल्कि उनकी छोटी बहन जया सिंह से भी उनका संपर्क टूट गया है। जया वर्तमान में कुशीनगर के हाटा में तहसीलदार के पद पर तैनात हैं और वह भी इस मामले की जांच के दायरे में हैं। डॉ. विश्वजीत ने साफ कहा कि सच सामने लाने की कीमत उन्हें परिवार टूटने के रूप में चुकानी पड़ी है।
दोनों अधिकारियों पर जांच बैठी
डॉ. विश्वजीत का दावा है कि प्रशांत और जया ने अलग-अलग वर्षों में, लेकिन एक ही डॉक्टर से दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवाया। उनके अनुसार प्रशांत ने 2009 में और जया ने 2012 में इसी डॉक्टर से 40 प्रतिशत दिव्यांगता का प्रमाण पत्र प्राप्त किया। आरोप है कि दोनों प्रमाण पत्र फर्जी हैं और इनके जरिए सरकारी सेवा में लाभ लिया गया। डॉ. विश्वजीत के पास इस संबंध में दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं, जिन्हें उन्होंने जांच एजेंसियों को सौंपा है। यही कारण है कि दोनों अधिकारियों पर जांच बैठी हुई है।
…ताकि इस्तीफा मंजूर होते ही न तो जांच आगे बढ़े और न ही रिकवरी हो
डॉ. विश्वजीत ने बताया कि इस मामले की औपचारिक शुरुआत 13 अक्टूबर 2025 को हुई, जब राज्य आयुक्त दिव्यांगजन कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई गई। इसके बाद सीएमओ मऊ को जांच के निर्देश दिए गए। 19 दिसंबर 2025 को सीएमओ मऊ ने स्वास्थ्य महानिदेशक को पत्र लिखकर कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए दिशा-निर्देश मांगे। आरोप है कि इसी के बाद जांच को प्रभावित करने की कोशिशें शुरू हुईं और जब यह संभव नहीं हो सका तो प्रशांत ने इस्तीफे का रास्ता अपनाया।
मेडिकल बोर्ड और जांच एजेंसियों के सामने कई सवाल
डॉ. विश्वजीत ने दस्तावेजों के साथ यह भी दावा किया कि प्रशांत की जन्मतिथि 28 अक्टूबर 1978 है और 27 अक्टूबर 2009 को उन्होंने 31 वर्ष की उम्र में सीएमओ मऊ से 40% दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवाया। इसी आधार पर उन्हें 2011 बैच में यूपी लोक सेवा आयोग के 4% दिव्यांग कोटे से चयन मिला। डॉ. विश्वजीत का कहना है कि जिस आंख की बीमारी के आधार पर दिव्यांगता दिखाई गई, वह उस उम्र में संभव नहीं है और यही सवाल अब मेडिकल बोर्ड और जांच एजेंसियों के सामने है।
प्रशांत कुमार सिंह का परिवार लंबे समय से सरकारी सेवा से जुड़ा रहा है
प्रशांत कुमार सिंह का परिवार लंबे समय से सरकारी सेवा से जुड़ा रहा है। उनके पिता त्रिपुरारी सिंह आजमगढ़ बिजली विभाग से बाबू पद से सेवानिवृत्त हुए। उनकी पत्नी वीणा सिंह मुंबई एयरपोर्ट पर स्पोर्ट्स कोटे से सिक्योरिटी इंचार्ज (दरोगा) रहीं और करीब पांच साल पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उनके दो बेटियां हैं, जिनकी उम्र 10 और 15 वर्ष बताई जाती है। पत्नी और बेटियां वर्तमान में लखनऊ में रहती हैं।
यूपी जीएसटी संगठन के चुनाव में भी हिस्सा लिया
प्रशांत का करियर केवल प्रशासन तक सीमित नहीं रहा, उन्होंने आजमगढ़ से एलएलबी करने के बाद छात्र राजनीति में सक्रियता दिखाई और दिवंगत सपा नेता अमर सिंह के करीबी रहे। अमर सिंह द्वारा गठित राष्ट्रीय लोकमंच पार्टी में वे मऊ के जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं। 2010 से 2013 के बीच उन्होंने कोचिंग कक्षाएं भी चलाईं और नौकरी के दौरान यूपी जीएसटी संगठन के चुनाव में भी हिस्सा लिया।
”अगर वह चुप रहते तो किसी असली दिव्यांग का हक मारा जाता”
धमकियों और सामाजिक दबाव के बावजूद डॉ. विश्वजीत ने कहा कि वे पीछे नहीं हटेंगे। उनका कहना है कि यह लड़ाई उनके भाई के खिलाफ नहीं बल्कि सिस्टम की सच्चाई के खिलाफ है और अगर वह चुप रहते तो किसी असली दिव्यांग का हक मारा जाता।





