नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए एक साल से भी कम समय बचा है और राजनीतिक सरगर्मी तेज हो चुकी है। भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुटे गए हैं। संभावना है कि सपा और कांग्रेस भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन (इंडिया) के बैनर तले साथ चुनाव लड़ें। दूसरी ओर बीजेपी अपने सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (निषाद पार्टी) के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है। वहीं बसपा फिलहाल अकेले दम पर चुनाव लड़ने का मन बना रही है। आने वाले महीनों में गठबंधन और समीकरण ही यूपी की सियासत की दिशा तय करेंगे।
यूपी में ओवैसी की एंट्री, चौथी बार मैदान की तैयारी
इन सबके बीच हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पूरे दमखम के साथ उतरने की तैयारी में है। अगर पार्टी इस बार चुनावी मैदान में उतरती है, तो यह यूपी में उसका चौथा प्रयास होगा।
ओवैसी की सक्रियता से चुनावी समीकरणों में नया ट्विस्ट आ सकता है, खासकर उन सीटों पर जहां अल्पसंख्यक वोट दावेदार भूमिका निभाते हैं। ऐसे में यूपी की सियासत में मुकाबला और बहुकोणीय होने के संकेत मिल रहे हैं।
PDM बनाम PDA: यूपी में तीसरा मोर्चा
वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने कुछ क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर एक अलग मोर्चा बनाया था। यह मोर्चा सपा प्रमुख अखिलेश यादव के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) विधायकों के जवाब में पीडीएम-यानी पिछड़ा, दलित, मुस्लिम-के नाम से खड़ा किया गया था।
इस मोर्चे ने 25 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, लेकिन दिलचस्प बात यह रही कि इनमें AIMIM का एक भी उम्मीदवार मैदान में नहीं था। यानी रणनीति गठबंधन के जरिए प्रभाव बढ़ाने की थी, न कि सीधे अपने कार्यक्षेत्र के दम पर। हालांकि यह प्रयोग चुनावी दौरों में खास असर नहीं छोड़ा पाया, लेकिन यह यूपी की सियासत में एक अलग ध्रुव बनाने की कोशिश जरूर दिखेगी।
क्या 2027 में AIMIM–बसपा साथ आएगी?
2027 के UP विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन हो सकता है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि गठबंधन को लेकर AIMIM का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड कैसा रहा है और क्या बसपा के “हाथी” पर सवार होकर वह राज्य में मजबूत एंट्री कर पाएगी?
UP में AIMIM ने पहले भी अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों के साथ तालमेल की कोशिश की है, लेकिन उसे अब तक बड़ा चुनावी ब्रेक तोड़ नहीं मिला। पार्टी का वोट शेयर सीमित क्षेत्रों तक केंद्रित रहा है और सीटों में गुटबाजी नहीं हो पाया। दूसरी ओर बसपा खुद भी पिछले चुनावों में अपने आधार को मजबूत बनाए रखने की चुनौती से जूझ रही है। ऐसे में अगर दोनों साथ आते हैं तो यह सामाजिक समीकरण-दलित और मुस्लिम वोट-को जोड़ने की कोशिश हो सकती है, लेकिन जमीन पर इसका असर कितना होगा, यह बड़ा सवाल है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन का गणित तभी काम करेगा जब राजनीति भी मजबूत हो। वरना यह प्रयोग भी सिर्फ दफ्तर तक सिमट सकता है। 2027 की राह लंबी है, लेकिन राजनीतिक चालें अभी से तेज हो चुकी हैं
यूपी में AIMIM का चुनावी प्रदर्शन
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने उत्तर प्रदेश में अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में जोर आजमाइश की, लेकिन नतीजे उसके पक्ष में नहीं रहे। वर्ष 2017 में पार्टी ने 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से 37 सीटों पर उनकी जमानत जब्त हो गई। कुल मिलाकर AIMIM को 2,04,142 वोट मिले। जिन सीटों पर पार्टी ने चुनाव लड़ा, वे मुख्यत: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बहुल क्षेत्र थे। इसके बावजूद, पार्टी वोटों को सीटों में दावेदार नहीं कर सकी।
इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने अपनी दावेदारी और गठबंधन किए हुए 95 सीटों पर चुनाव लड़ा। हालांकि, इस बार भी प्रदर्शन नाकाम रहा और पार्टी को महज 0.49% वोट शेयर ही मिल सका। इन आंकड़ों से साफ है कि यूपी में AIMIM की चुनावी पकड़ अभी बहुत सीमित रही है। ऐसे में 2027 में अगर वह किसी बड़े दल-जैसे बसपा के साथ गठबंधन करती है, तो यह उसके लिए अस्तित्व और प्रभाव दोनों के फीस से अहम नागरिकता कदम हो सकता है।
2024 में ओवैसी का अलायंस कितना असरदार रहा?
2024 के लोकसभा चुनाव में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने पीडीएम मोर्चे के तहत खुद कोई उम्मीदवार नहीं उतारा। रणनीति यह थी कि सहयोगी दलों को समर्थन देकर सामाजिक समीकरण साधे जाएं, लेकिन जमीन पर इसका खास फायदा नजर नहीं आया। पीडीएम के सहयोगी दल के तौर पर अपना दल (कमेरावादी) की नेता पल्लवी पटेल ने उम्मीदवार उतारे, लेकिन उन्हें कुल मतों का सिर्फ 0.4% वोट मिला और परिणाम शून्य रहा। साफ है कि AIMIM के समर्थन से कोई खास वोट ट्रांसफर नहीं हुआ।
बसपा के साथ ओवैसी कितने फिट?
अगर बहुजन समाज पार्टी की स्थिति देखें तो 2024 लोकसभा चुनाव में उसे 9.46% वोट मिले, लेकिन एक भी सीट हासिल नहीं हुई। विधानसभा में भी सीटों की गिनती बहुत सीमित है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि AIMIM और सीटों का संभावित गठबंधन सामाजिक समीकरण-दलित और मुस्लिम-को जोड़ने की कोशिश तो हो सकती है, लेकिन मौजूदा हालात में इससे किसी बड़े चुनावी “चमत्कार” की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। अब नजर 2027 पर है-क्या AIMIM अपनी रणनीति बदलेगी? क्या वह खुद ज्यादा सीटों पर लड़ेगी या फिर गठबंधन की राजनीति पर दांव लगाएगी? यूपी की सियासत में उसकी असली परीक्षा अभी बाकी है।





