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Sunday, March 15, 2026
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राम मंदिर की दूसरी वर्षगांठ 22 जनवरी को नहीं 31 दिसंबर को मनाई जाएगी, चंपत राय ने दी बड़ी जानकारी

राम मंदिर की दूसरी वर्षगांठ इस साल 22 जनवरी को नहीं, बल्कि हिंदू पंचांग के अनुसार 31 दिसंबर 2025 को प्रतिष्ठा द्वादशी के रूप में मनाई जाएगी।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में स्थित भव्य राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा समारोह की दूसरी वर्षगांठ इस बार 22 जनवरी को नहीं, बल्कि 31 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय ने मीडिया को बताया कि यह निर्णय धार्मिक और पंचांग आधारित महत्व को ध्यान में रखकर लिया गया है। बता दे कि, राम भक्तों में यह भ्रम था कि पहले प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दिन 22 जनवरी 2024 की तरह हर साल यही तारीख वर्षगांठ के लिए अपनाई जाएगी। लेकिन चंपत राय ने स्पष्ट किया कि राम मंदिर की वर्षगांठ हिंदू पंचांग के अनुसार ‘प्रतिष्ठा द्वादशी’ के रूप में मनाई जाती है।

हिंदू पंचांग के अनुसार होगी धूमधाम

चंपत राय ने कहा, “इस साल रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह की दूसरी वर्षगांठ 31 दिसंबर 2025 को पड़ रही है। ट्रस्ट इस अवसर को ‘प्रतिष्ठा द्वादशी’ के रूप में मानेगा। इस दिन देश-विदेश से श्रद्धालुओं और संतों के आने की विशेष व्यवस्था की जाएगी। बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।”

ट्रस्ट ने यह निर्णय इसलिए लिया है ताकि प्राण प्रतिष्ठा की तिथि का धार्मिक महत्व और पवित्रता बनी रहे। हिंदू धर्म में सभी प्रमुख पर्व और अनुष्ठान चंद्र कैलेंडर (हिंदू पंचांग) के अनुसार तय होते हैं, न कि अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार।

द्वादशी तिथि का धार्मिक महत्व

‘द्वादशी’ संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है बारहवाँ। यह चंद्र मास की 12वीं तिथि होती है।

चंद्र मास में दो पक्ष होते हैं:

शुक्ल पक्ष: अमावस्या के बाद बढ़ता चंद्रमा (12वीं तिथि = शुक्ल द्वादशी)

कृष्ण पक्ष: पूर्णिमा के बाद घटता चंद्रमा (12वीं तिथि = कृष्ण द्वादशी)

धार्मिक महत्व

द्वादशी तिथि मुख्य रूप से भगवान विष्णु को समर्पित है।

इस दिन विष्णु और उनके अवतारों की पूजा, व्रत और धार्मिक अनुष्ठान करना बहुत शुभ माना जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी को ही किया जाता है।

विशेष द्वादशियां

वामन द्वादशी-भगवान विष्णु के वामन अवतार से संबंधित

गोवत्स द्वादशी-दिवाली से पहले; गाय-बछड़ों की पूजा

तुलसी विवाह द्वादशी-कार्तिक मास में तुलसी और शालीग्राम का विवाह

राम मंदिर और ‘प्रतिष्ठा द्वादशी’

चूंकि भगवान राम स्वयं विष्णु के अवतार हैं, इसलिए उनकी प्राण प्रतिष्ठा की वर्षगांठ को ‘प्रतिष्ठा द्वादशी’ के रूप में मनाना धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से उचित है। यह तिथि रामलला के मंदिर में उनकी स्थापना को विष्णु तत्व से जोड़ती है और इसे और भी अधिक पुण्यकारी बनाती है।

द्वादशी तिथि का धार्मिक महत्व

‘द्वादशी’ संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है बारहवाँ। यह चंद्र मास की 12वीं तिथि होती है।

चंद्र मास में दो पक्ष होते हैं

शुक्ल पक्ष: अमावस्या के बाद चंद्रमा बढ़ता है (12वीं तिथि = शुक्ल द्वादशी)

कृष्ण पक्ष: पूर्णिमा के बाद चंद्रमा घटता है (12वीं तिथि = कृष्ण द्वादशी)

धार्मिक महत्व

द्वादशी तिथि मुख्य रूप से भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है।

इस दिन विष्णु और उनके अवतारों की पूजा, व्रत और धार्मिक अनुष्ठान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

एकादशी व्रत का पारण द्वादशी को ही किया जाता है।

भव्य तैयारी और श्रद्धालुओं की आमद

अयोध्या में 31 दिसंबर 2025 को बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। देश-विदेश से श्रद्धालु और संत इस पवित्र अवसर का हिस्सा बनेंगे।

पिछले दिनों मंदिर में हुए ध्वजारोहण समारोह ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। उस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत सहित कई दिग्गज हस्तियां मौजूद थीं।

अयोध्या में 31 दिसंबर को बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। देश-विदेश से आए श्रद्धालु और संत इस पवित्र अवसर का हिस्सा बनेंगे।

पिछले दिनों मंदिर में हुए ध्वजारोहण समारोह ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। उस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत सहित कई दिग्गज हस्तियां मौजूद थीं।राम मंदिर की दूसरी वर्षगांठ 22 जनवरी नहीं, बल्कि 31 दिसंबर 2025 को ‘प्रतिष्ठा द्वादशी’ के रूप में मनाई जाएगी। यह निर्णय धार्मिक महत्व और पंचांग आधारित शुभता को ध्यान में रखकर लिया गया है।

ट्रस्ट ने यह निर्णय इसलिए लिया है ताकि प्राण प्रतिष्ठा की तिथि का धार्मिक महत्व और पवित्रता बनी रहे। हिंदू धर्म में सभी प्रमुख पर्व और अनुष्ठान चंद्र कैलेंडर (हिंदू पंचांग) के अनुसार तय होते हैं, न कि अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार।

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