back to top
35.1 C
New Delhi
Sunday, March 29, 2026
spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

यूपी पुलिस के हाफ एनकाउंटर पर सवालिया निशान, कोर्ट ने मांगा जवाब, वरिष्ठ अधिकारियों की छवि बचाने की कोशिश?

उत्तर प्रदेश में हाफ एनकाउंटर बढे हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस को चेतावनी दी है की कानून के दायरे में रहकर कार्यवाई हो वरना न्यायालय खुद हस्तक्षेप करेगा।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में कथित हाफ एनकाउंटर की बढ़ती घटनाओं पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि आरोपियों के पैरों में गोली मारकर बाद में उसे मुठभेड़ बताना सतही और खतरनाक प्रवृत्ति है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड देने का अधिकार केवल न्यायालयों के पास है, पुलिस के पास नहीं। न्यायिक अधिकार क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अतिक्रमण अस्वीकार्य है, क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां शासन और कानून के दायरे के भीतर ही चलता है।

हाईकोर्ट ने डीजीपी और गृह सचिव से जवाब तलब किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के डीजीपी और गृह सचिव से सवाल किया है कि क्या पुलिस अधिकारियों को आरोपियों के पैरों या शरीर के अन्य हिस्सों में गोली मारने के संबंध में कोई मौखिक या लिखित निर्देश दिए गए थे। अदालत ने नोट किया कि अब ऐसे मुठभेड़ नियमित घटना बनने लगे हैं, जिनका उद्देश्य कथित तौर पर वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करना या आरोपियों को सबक सिखाना हो सकता है।

मामूली अपराध में भी मुठभेड़ का रूप

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कई मामलों में पुलिस मामूली अपराधों में अंधाधुंध गोलीबारी कर घटनाओं को मुठभेड़ का रूप दे देती है। यह टिप्पणी अदालत ने मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार और दो अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की, जो अलग-अलग मुठभेड़ों में घायल हुए थे। अदालत ने नोट किया कि इन घटनाओं में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई, जिससे बल प्रयोग की आवश्यकता और अनुपातिकता पर गंभीर सवाल उठते हैं।

मुठभेड़ मामले में जांच प्रक्रिया पर सवाल

एक मामले में अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि कथित मुठभेड़ के संबंध में एफआईआर दर्ज हुई या नहीं और क्या घायल का बयान मजिस्ट्रेट या चिकित्सा अधिकारी के सामने दर्ज किया गया। राज्य की ओर से जानकारी दी गई कि एफआईआर तो दर्ज हुई, लेकिन घायल का बयान न तो मजिस्ट्रेट और न ही किसी डॉक्टर के सामने लिया गया। इसके अलावा अदालत को बताया गया कि शुरुआत में जांच एक सब-इंस्पेक्टर को सौंपी गई थी, जिसे बाद में एक इंस्पेक्टर को स्थानांतरित कर दिया गया। यह पूरे मामले में जांच की पारदर्शिता और गंभीरता पर सवाल खड़े करता है।

हाईकोर्ट की कड़ी चेतावनी

इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ, जिनकी अध्यक्षता जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल कर रहे थे, ने कथित मुठभेड़ों के मामलों पर गंभीर टिप्पणी की। दलीलों पर गौर करते हुए अदालत ने कहा कि इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय मुठभेड़ संबंधी दिशानिर्देशों का पालन नहीं हो रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून और न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही दंड का अधिकार न्यायालयों के पास है, और पुलिस का किसी भी रूप में इस क्षेत्र में अतिक्रमण अस्वीकार्य है।

Advertisementspot_img

Also Read:

होली से पहले यूपी कर्मचारियों में खुशी की लहर, योगी सरकार ने फरवरी वेतन 28 फरवरी को देने का आदेश जारी किया

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क । उत्तर प्रदेश में होली से पहले सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों के लिए खुशखबरी आई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार...
spot_img

Latest Stories

FIR दर्ज नहीं कर रही पुलिस? जानिए आपके पास मौजूद कानूनी विकल्प और अधिकार

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। अगर कोई व्यक्ति अपराध का शिकार...

Delhi Vehicle Market: 10 हजार में बाइक और 50 हजार में कार, लेकिन खरीदने से पहले जान लें ये जरूरी बातें

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। राजधानी दिल्ली में ऐसे कई ऑटो...
⌵ ⌵ ⌵ ⌵ Next Story Follows ⌵ ⌵ ⌵ ⌵