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Monday, March 23, 2026
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1857 में मेवाड़ का अवदान नहीं भुलाया जा सकता-डाॅ. महावीर प्रसाद

-इतिहास संकलन समिति चित्तौड़ प्रांत की ओर से मेवाड़ अतीत से वर्तमान तक व्याख्यानमाला उदयपुर, 17 मई (हि.स.)। भारत से अंग्रेजों को सत्ताच्युत करने के लिए सन् 1857 में हुआ स्वतंत्रता संग्राम मेवाड़, वागड़ और आस-पास के क्षेत्रों में प्रबलता से दिखाई दिया। वस्तुतः राजस्थान में तुर्क के सामने लड़ने का माद्दा मेवाड़ के महाराणा हम्मीर सिंह ने दिखाया और फिर 16वीं सदी आते-आते हम तुर्कों को भारत से बाहर करने की स्थिति में भी थे लेकिन महाराणा सांगा की परिस्थितिवश हुई पराजय ने अभी संघर्ष की और सदियां हमारे लिए छोड़ी थी। इस संघर्ष का अंत स्वाभाविक रूप से 1947 में हो गया लेकिन उस समस्या से से निकलने के लिए हम आज तक संघर्षरत हैं। अंग्रेजों के खिलाफ पूरे भारत में एक साथ और योजनाबद्ध युद्ध सन् 1857 में लड़ा गया, इसीलिए इतिहासकारों ने इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम बताया। यह बात इतिहास संकलन समिति चित्तौड़ प्रांत की ओर से मेवाड़ अतीत से वर्तमान तक व्याख्यानमाला की ‘1857 की क्रांति और मेवाड़’ विषयक वेबगोष्ठी में उभरी। गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए मुख्य वक्ता डाॅक्टर महावीर प्रसाद जैन ने कहा कि मेवाड़ के सामंत अंग्रेजों व महाराणा से नाराज थे। इन सामन्तों में आपसी फूट भी थी। महाराणा ने मेवाड़ के सामन्तों को अंग्रेजों की सहायता करने की आज्ञा दी। इसी समय सलूम्बर के रावत केसरी सिंह ने उदयपुर के महाराणा को चेतावनी दी कि यदि आठ दिन में उनके परम्परागत अधिकार को स्वीकार न किया गया तो वह उनके प्रतिद्वंद्वी को मेवाड़ का शासक बना देंगे। सलूम्बर के रावत केसरी सिंह ने आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह को अपने यहां शरण दी। इसी समय तांत्या टोपे ने राजपूताने की ओर कूच किया। वह मेवाड़ के माण्डलगढ़ और यहां से कोठारिया पहुंचे। 1859 में उन्हें मेवाड़ छोड़ना पड़ा और नरवर के मानसिंह ने धोखा किया और गिरफ्तार कर लिया। यद्यपि सामंतों ने प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश सरकार का विद्रोह नहीं किया परन्तु विद्रोहियों को शरण देकर इस क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम में ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने बताया कि मेवाड़ के स्वभाव में ही क्रांति है। उन्होंने कहा कि यही प्रभाव था कि महाराणा के समर्थन के बावजूद नीमच में सैनिकों ने संग्राम में अपनी आहुति दी। हीरा सिंह और मोहम्मद अली बेग के नेतृत्व में विद्रोह किया। यहां एबॉट नामक ब्रिटिश अधिकारी नियुक्त था। क्रांतिकारियों से भयभीत अंग्रेजों ने मेवाड़ में शरण ली, जहां पर डूंगला नामक गांव के किसान रुगाराम ने अंग्रेजों को शरण दी। कोटा, बूंदी और मेवाड़ की सैनिक सहायता से कैप्टन शावर्स 6 जून को नीमच में संग्राम को रोकने में सफल हुआ। के.एस. गुप्ता ने अपने उद्बोधन में बताया कि क्रांति के इस महायज्ञ को धधकाने की योजना अजीमुल्ला खां तथा रंगोबापूजी ने लंदन में बनाई थी। योजना बनाकर ये दोनों उत्कट राष्ट्र-भक्त पेशवा के पास आए और उन्हें इस अद्भुत समर का नेतृत्व करने को कहा। सैनिक अभियान के नायक के रूप में तांत्या टोपे को तय किया गया। संघर्ष के लिए संगठन खड़ा करने तथा जन-जागरण का काम पूरे दो साल तक किया गया। राजस्थान में नसीराबद छावनी, अजमेर में विद्रोह के बाद असंतोष बढ़ गया और नीमच छावनी में 3 जून 1857 को नीमच के विद्रोहियों ने कई ब्रितानियों को मौत के घाट उतार दिया। फलस्वरूप ब्रितानियों ने भी बदला लेने की योजना बनाई। उन्होंने 7 जून को नीमच पर अपना अधिकार कर लिया। बाद में विद्रोही राजस्थान के दूसरे इलाकों की तरफ बढ़ने लगे। क्षेत्रीय संगठन मंत्री छगनलाल बोहरा ने 1857 की क्रांति का राजस्थान में स्वरूप पर बात रखी। उन्होंने कहा कि राजस्थान में क्रांति के प्रारम्भ होने का मुख्य कारण ए.जी.जी. जाॅर्ज पैट्रिक लाॅरेंस द्वारा भारतीय सैनिकों में अविश्वास प्रकट करना था। राजस्थान की प्रमुख छह रियासतों कोटा, झालावाड़, टोंक, बांसवाड़ा, धौलपुर व भरतपुर में क्रांति के राजस्थान के नायकों ने अधिकार कर लिया था। बूंदी महाराव के अतिरिक्त राजस्थान के सभी राजाओं ने अंग्रेजों का पूर्ण समर्थन किया। राजस्थान में कवि सूर्यमल मीसण ने सबसे पहले 1857 के संघर्ष को स्वतंत्रता संग्राम कह कर सम्बोधित किया। हिन्दुस्थान समाचार/सुनीता कौशल / ईश्वर

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