बांसवाड़ाा, 29 मई ( हि.स.)। कोरोना कॉल महामारी भले ही स्वास्थ्य के लिए नुकसान देने वाली साबित हो रही है, लेकिन इस महामारी में लगाया लॉकडाउन कई सामाजिक पुराने रीति-रिवाजों में बदलाव लाने में कारगर साबित हो रहा है। चाहे सुख भी घड़ी हो या दुख की कई परंपराएं ऐसी हैं जो परिवार को आर्थिक रूप से क्षति पहुंचाती हैं। कई समाजों ने इस आपदा में उन परंपराओं को बदलने के बड़े फैसले लिए हैं । बांसवाड़ा शहर में वैष्णव समाज के एक परिवार में मृत्यु के बाद होने वाली परंपरा में ऐसा ही बदलाव किया गया। शहर के 97 साल के रिटायर्ड फॉरेस्टर और भुआसा वैष्णव समाज के महंत रामदास के देहावसान पर उनकी बेटी और बहनों ने द्वादशा के अवसर पर अपने भाई और भाभी को तुलसी का पौधा और मिट्टी का गमला दिया। यहां यह परंपरा चली आ रही है कि मृत्यु के 12 वें दिन भाइयों के लिए बहनें टोपी और भाभी को वस्त्र भेंट करती हैं । यह रिवाज सालों साल से चला आ रहा है। यह बदलाव इसलिए भी किया गया कि हर भाई भाभी उसकी याद में तुलसी का पौधा सहज कर अपने आंगन में रखेगा। सामाजिक बदलाव की बयार की अगुवाई शीतल भंडारी, सुषमा भंडारी, प्रियंका वैष्णव, रितु वैष्णव , दीपिका बैरागी , चेस्टा वैष्णव, शंभवी वैष्णव विनी भंडारी और संस्कृति भंडारी, आशा वैष्णव, अनन्या वैष्णव आदि बहनों ने की। हिन्दुस्थान समाचार/सुभाष/संदीप




