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झाबुआ की आदिवासी गुड़िया को जल्द मिलेगा जीआई टैग

आदिवासी संस्कृति को जीवित रख रहे हैं सुभाष गिदवानी इंदौर, 22 फरवरी (हि.स.)। इंदौर संभाग के झाबुआ जिले में बनाई जाने वाली आदिवासी गुड़िया को जल्द ही भारत की विश्व प्रसिद्ध डार्जिलिंग चाय के तर्ज पर जीआई टैग वाले उत्पादों की सूची में शामिल किया जायेगा। मध्यप्रदेश की यह अनौखी गुड़िया भील और भीलाला आदिवासियों की विरासत है, जिसे पिछले कई दशकों से झाबुआ आदिवासियों द्वारा संरक्षित कर ना केवल प्रदेश बल्कि देश भर में एक नयी पहचान दिलाई गई है। यह जानकारी सोमवार को जनसम्पर्क उपसंचालक डॉ. आरआर पटेल ने दी। उन्होंने बताया कि झाबुआ की इस अनूठी कला का संरक्षण करने वाले कुछ शिल्पकारों में से एक है झाबुआ निवासी सुभाष गिदवानी, जो जिले की आदिवासी संस्कृति के अनुरूप कपडे़ की गुडिया का व्यवसाय पिछले 40 वर्ष से कर रहे हैं। गिदवानी बताते हैं कि आरम्भिक दिनों में प्रचार-प्रसार कम होने के कारण इसकी बिक्री कम हो पाती थी। लेकिन जैसे-जैसे इसका प्रचार-प्रसार हुआ वैसे-वैसे इस खिलौने की मांग बढ़ने लगी और इसके विक्रय से आमदनी में भी इजाफा होने लगा। वे कहते है कि भारत सरकार द्वारा दिये जा रहे जीआई टैग से झाबुआ की गुड़िया आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश के निर्माण में एक नया मील का पत्थर सिद्ध होगी क्योंकि इससे अन्य हस्तशिल्प के उत्पादों को भी प्रोत्साहन मिल सकेगा। सुभाष गिदवानी ने बताया कि इस व्यवसाय में परिवार के चार सदस्य लगे हैं और 10 अन्य कारिगरों को रोजगार प्रदान कर रहे हैं। मध्य प्रदेश हस्तशिल्प विकास निगम भोपाल द्वारा उन्हें वर्ष 1989-90 में गुड़िया निर्माण के लिये पुरस्कृत भी किया गया था। दिल्ली के प्रगति मैदान, जयपुर, खजुराहो, हैदराबाद, रोहतक, बैंगलोर, कलकत्ता, रायपुर, चण्डीगढ, हरियाणा, भोपाल हाट सहित सम्पूर्ण भारत में झाबुआ के खिलौने की बिक्री की जा रही है। झाबुआ के हस्तशिल्प के इस प्रतिक चिन्ह की बडे-बडे प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा मांग की जाती है। शासकीय प्रदर्शनी के माध्यम से इसके प्रचार-प्रसार में निरंतर गति प्रदान हो रही है। भारत सरकार वस्त्र मंत्रालय तथा जिला व्यापार एवं उद्योग केन्द्र तथा मध्य प्रदेश हस्तशिल्प निगम भोपाल, आदिवासी लोक कला परिसद में भी इसका पंजीयन किया जा चुका है। झाबुआ की गुडि़या को अन्य जिलों एवं प्रदेशों से आर्डर प्राप्त होने पर भी भेजा जाता है। सुभाष गिदवानी झाबुआ की आदिवासी संस्कृति को जीवित रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इनके माध्यम से झाबुआ जिले की आदिवासी संस्कृति देश-विदेश में अपनी अलग पहचान बना पा रही है। हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश

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