पाकुड़, 18 जून (हि.स.)। हमारे देश में पालकी का उपयोग शादी विवाह के अलावा राजा महाराजाओं के साथ ही तत्कालीन रईसों द्वारा सदियों से किया जाता रहा है। भारत में शादी को एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्कार माना गया है। सभ्य समाज के लोग आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी इस परंपरा का अनुसरण करते आ रहे हैं। कभी पालकी इस परंपरा के निर्वहन का अनिवार्य अंग हुआ करती थी लेकिन आधुनिक युग में पालकी की परम्परा विलुप्त प्राय सी हो गई है। खासकर संथाल समाज में होने वाले बापला (विवाह) में अन्य रस्मों में एक पालकी (जिसे संथाल समाज में राही कहा जाता है ) का भी स्थान है। जिसमें बैठकर दूल्हा, दुल्हन के घर बारात लेकर जाता है। फिर शादी की रस्म पूरी कर उसी पालकी पर दुल्हन को लेकर अपने घर वापस आता है।कभी मान्यता थी कि बगैर पालकी के शादी का रस्म ही पूरा नहीं हो सकता। हालांकि आधुनिकता के इस युग में इसका प्रचलन कम ही देखने को मिलता है। लोग पालकी के बजाय महंगी गाड़ियों व अन्य माध्यमों से बारात लेकर जाने लगे हैं। जिस चलते पालकी ढोने वाले कहारों को आज बमुश्किल ही काम मिल पाता है। वजह आधुनिकता के साथ ही सुविधाभोगी होते जा रहे लोगों का परंपरागत चीजों से मोह भंग होना भी है।आमतौर पर दूल्हा पक्ष द्वारा पालकी भाड़े पर लिया जाता है। पालकी ढोने वाले कहारों या मजदूरों की मजदूरी दूरी के हिसाब से तय की जाती है। कहारों की संख्या कमोबेश छह से आठ होती है। जो बारी-बारी से लंबी दूरी के सफर को तय करते हैं। विवाह पूर्ण होने के बाद दूल्हे के अलावा दुल्हन को भी साथ लाना पड़ता है। कहार या मजदूरों को इसमें काफी परिश्रम करना पड़ता है। पालकी परंपरागत व सदियों पुरानी सवारी है। पालकी को शुभ माना जाता है। आदिवासी समाज में भी इसकी एक अलग पहचान है। मान्यता है कि इसके बिना शादी का रस्म अधूरा है। पालकी में सवार व्यक्ति आराम से बैठता या लेटता है जिसे मज़दूर कंधे पर उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते हैं। बकौल शिवलाल मरांडी सनातन आदिवासी समाज में पालकी के उपयोग की प्रथा पारंपरिक है। इसे हमलोग शुद्ध मानते हैं। आज भी कई लोग इस परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं।लेकिन वर्तमान परिवेश में सुविधाजनक व किफायती होने के चलते हमारे समाज के भी अधिकांश लोग पालकी के बजाय चार पहिया अथवा अन्य बड़े वाहनों का उपयोग अधिक करने लगे हैं। हिन्दुस्थान समाचार/ कुमार रवि




