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कोरोना काल में दिल्ली उर्दू अकादमी का अस्तित्व ख़तरे में पड़ा, दो साल से जारी नहीं किया बजट

– बजट की कमी के कारण 27 पद पड़े हैं रिक्त, 163 किताबें छपने का कर रही है इंतजार नई दिल्ली, 14 जून (हि.स.)। कोरोना वायरस महामारी के दौरान दिल्ली में उर्दू अकादमी का अस्तित्व ही समाप्त होने के करीब पहुंच गया है। पिछले दो सालों में अकादमी की सभी सरगर्मियां पूरी तरह से रुक सी गई हैं। दिल्ली में उर्दू को जिंदा रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली उर्दू अकादमी ने अपने आपको अपने दफ्तर तक ही समेट कर रख लिया है। कोरोना महामारी के दौरान उर्दू अकादमी को आर्थिक रूप से कमजोर बना दिया गया है। पैसों की कमी की वजह से अकादमी की सारी सरगर्मियां रुक सी गई है। उर्दू भाषा और साहित्य को संरक्षण देने में दिल्ली ने हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दिल्ली में सरकार के जरिए उर्दू अकादमी का गठन किया गया है लेकिन सरकार के भेदभावपूर्ण रवैये की वजह से उर्दू भाषा दिन प्रतिदिन अपना अस्तित्व खोती जा रही है। दिल्ली उर्दू अकादमी की पिछले दो साल में सबसे खराब स्थिति देखने को मिली है। अकादमी के 10 करोड़ रुपये के बजट को कोरोना के नाम पर सरकार ने हड़प लिया है। बजट की कमी की वजह से अकादमी में 27 पद रिक्त पड़े हुए हैं और 163 पुस्तकें मंजूरी के बाद भी छपने का इंतेज़ार कर रही हैं। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार का रवैया उर्दू के प्रति अच्छा नहीं है। दिल्ली के उर्दूदां लोग की शिकायत है कि सरकार ने उर्दू अकादमी का वाइस चेयरमैन एक ऐसे व्यक्ति को बनाया है जो उर्दू भाषी नहीं है। उसका एक ही गुण है कि वह सरकार के बीरबलों में शुमार किए जाते हैं। दिल्ली सरकार ने जानबूझ कर ऐसे व्यक्ति को यहां का जिम्मेदार बनाया है ताकि उर्दू अकादमी के ताबूत में आखिरी कील ठोकने का काम किया जा सके। उर्दू अकादमी का बजट 10 करोड़ है जो पहले से ही तय है। इसके बावजूद, उर्दू अकादमी को पिछले दो साल से पैसा जारी नहीं किया गया है। लाइब्रेरियन और उर्दू मासिक के संपादकों सहित अकादमी के 27 महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हुए हैं। इसके अलावा 163 पुस्तकें जिन पर विशेषज्ञों की राय ले ली गई है, उन्हें कई वर्षों से अलमारियों की शोभा बना कर क्यों रखा गया है? लोगों का कहना है कि जब कई साल पहले के मसौदे धूल चाट रहे हैं, तो नए मसौदों की बारी कब आएगी। अकादमी की तरफ से दो साल से किताबों पर कोई पुरस्कार नहीं दिया गया है और न ही अन्य साहित्यिक पुरस्कारों का कुछ पता हैं। उर्दू गेस्ट टीचर भी अपने वेतन से वंचित हैं और उर्दू के नाम पर कार्यक्रम भी नदारद हैं। उर्दू साहित्य के वरिष्ठ नागरिकों के लिए मासिक वज़ीफ़ा केवल 25-30 लोगों तक ही सीमित है जबकि यह योजना दिल्ली में सैकड़ों लोगों तक बढ़ाई जा सकती है। दिल्ली सरकार का अन्य भाषा अकादमियों के प्रति भी यही रवैया है। इसी तरह उर्दू शायरों और लेखकों को लेकर भी सरकार लापरवाह है। सरकार निर्माण श्रमिकों और ऑटो चालकों को कोरोना काल की विकट स्थिति से निपटने के लिए 5,000 रुपये दे सकती है लेकिन सभ्यता के संरक्षको को जिनके पास आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है, उन्हें मरने और सिसकने के लिए छोड़ देती हैं। दिल्ली उर्दू अकादमी की इस समय की सबसे खराब स्थिति की जिम्मेदारी दिल्ली सरकार के साथ-साथ उसके उपाध्यक्ष पर भी है। उपाध्यक्ष का काम सरकार की हां में हां मिलाना नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी को पूरा करना है। अगर वह जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगे तो सरकार को अकादमी की सही स्थिति का पता कैसे चलेगा। आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष कलीमुल हफीज ने दिल्ली उर्दू अकादमी के ताजा हालात पर अफ़सोस का इजहार किया है। उनकी मांग है की अकादमी का बजट बढ़ाया जाए। दोनों वर्षों की बकाया राशि अविलम्ब जारी की जाए। सभी स्वीकृत किताबों के छापने का रास्ता हमवार किया जाए, रिक्त पदों को दो माह के अन्दर भरा जाए, लेखकों एवं शायरों के लिए मासिक वज़ीफ़ा निर्धारित किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि यदि साहित्यिक कार्यक्रम ऑफलाइन नहीं हो सकते हैं तो ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। हिन्दुस्थान समाचार/एम ओवैस

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