भागलपुर, 2 मई (हि.स.)। परिधि की ओर से आयोजित तीन दिवसीय मंजूषा चित्र कार्यशाला का रविवार को समापन हो गया। यह कार्यशाला वर्चुअल माध्यम से आयोजित हुआ था। जिसके मुख्य प्रशिक्षक राहुल थे। कार्यशाला में बच्चों ने मंजूषा पेंटिंग के बारीकियों को सीखा और बिहुला विषहरी गाथा पर केंद्रित कई चित्रों को अपने कागज पर उकेरा। चित्र के साथ साथ बच्चों को बिहुला विषहरी गाथा सुनने और जानने की भी उत्कट इच्छा थी। इसीलिए कार्यशाला में कई बार संक्षेप में बिहुला विषहरी गाथा को भी बताया गया। बच्चों ने गाथा के मुख्य पात्र सांपो की देवी विषहरी, चांदो सौदागर, सोनालिका, बिहुला, बाला लखेन्द्र के साथ-साथ नेतुला धोबिन, टुन्नी राक्षसी, हाथी, घोड़ा, गधा, मोर आदि चित्रों को बहुत ही ध्यान से सीखा। किसी भी चित्र में कान का ना होना इन लोगों के लिए कौतूहल का विषय था। यह मंजूषा पेंटिंग की खासियत । प्रशिक्षक राहुल ने बताया की पारंपरिक रूप से मंजूषा पेंटिंग में तीन तरह के ही रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। हरा, पीला और गुलाबी रंगों के इस्तेमाल से इसे बहुत खूबसूरत बनाया गया। समापन के अवसर पर सार्थक भरत ने कहा कि मंजूषा चित्रकला अंगक्षेत्र की पहचान है। इसका विकास और संवर्धन आने वाली पीढ़ी यानि बच्चे ही कर सकते हैं इसलिए बच्चों में मंजूषा चित्रकला का बढ़ना बहुत जरूरी है। यह सिर्फ भागलपुर ही नहीं अपितु पूरे बिहार का गौरव है। लोक कला आम लोगों की कला होती है। इसमें आम लोगों की जिजीविषा, उसका श्रम और उसका नायक शामिल होता है। इसीलिए लोकगाथा में भी आम लोगों जैसे पात्र बहुतायत में होते हैं। अपनी बात रखते हुए कृतिका ने कहा कि क्योंकि इसमें तीन ही रंगों का इस्तेमाल होता है इसलिए तीनों रंगों के बेहतर तालमेल को सीखना जरूरी है, वरना पेंटिंग बिगड़ जाने का खतरा होता है। हिन्दुस्थान समाचार/बिजय/चंदा




