नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । बिहार की सीतामढ़ी विधानसभा सीट हर बार अपने चुनावी समीकरणों को लेकर चर्चा में रहती है। खासकर तब, जब यहां से किसी राजनीतिक दल का अल्पसंख्यक प्रत्याशी मैदान में उतरता है। ऐसे में यह सीट अपने आप हॉट सीटों की श्रेणी में आ जाती है। इस क्षेत्र में पहली बार चुनाव 1952 में हुआ था और तब से अब तक कई दिलचस्प राजनीतिक घटनाएं देखने को मिली हैं। इन्हीं में से एक है, एक ही परिवार के तीन पीढ़ियों का विधायक बनना। यह अद्वितीय रिकॉर्ड जुड़ा है पूर्व सांसद सुनील कुमार पिंटू के परिवार से। इस परिवार के दादा, पिता और पोते, तीनों को अलग-अलग समय में विधायक बनने का अवसर मिला। जिले में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है, जहां एक ही परिवार की तीन पीढ़ियां विधानसभा तक पहुंची हों। इतना ही नहीं, सीतामढ़ी सीट से सीपीआई (CPI) को सिर्फ एक बार ही जीत हासिल हुई है, जो अपने आप में एक खास राजनीतिक रिकार्ड है।
वर्ष 1962 में किशोरी लाल साह बने थे विधायक
पूर्व सांसद सुनील कुमार पिंटू के दादा किशोरी लाल साह ने पहली बार 1962 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। वे उस समय कांग्रेस के प्रत्याशी थे और उन्हें 41.27% वोट मिले थे। कुल 17,225 मतों के साथ वे विजयी हुए। इस चुनाव में कुल 80,886 मतदाता पंजीकृत थे, जिनमें से 44,345 (54%) वोटरों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। हालांकि, 1969 के चुनाव में जब किशोरी लाल साह ने दोबारा कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा, तो उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस बार वे महज 8,034 वोट ही प्राप्त कर सके और तीसरे स्थान पर रहे। उस चुनाव में महंत श्याम सुंदर दास ने जीत हासिल की थी।
1995 में पूर्व सांसद पिंटू के पिता हरिशंकर प्रसाद ने दर्ज की थी जीत
1969 के चुनाव के बाद पिंटू परिवार से अगली बार 1995 में हरिशंकर प्रसाद (पूर्व सांसद सुनील कुमार पिंटू के पिता) ने चुनावी मैदान में कदम रखा। इस बार परिवार की पार्टी भी बदल चुकी थी। हरिशंकर प्रसाद ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से चुनाव लड़ा। उन्होंने उस समय के जनता दल प्रत्याशी मो. शाहिद अली खां को हराकर जीत हासिल की और विधायक बने। इसके बाद वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में हरिशंकर प्रसाद फिर से मैदान में उतरे, लेकिन इस बार उन्हें निर्वाची पदाधिकारी द्वारा पराजित घोषित कर दिया गया, जिसे उन्होंने अनुचित माना। वे इस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए, जहां से उन्हें न्याय मिला और चुनाव परिणाम उनके पक्ष में पलट गया। हालांकि तब तक विधानसभा कार्यकाल के केवल छह महीने ही शेष रह गए थे।
तीसरी पीढ़ी के सुनील कुमार पिंटू ने संभाली विरासत, जीते लगातार तीन चुनाव
वर्ष 2005 में पूर्व सांसद सुनील कुमार पिंटू ने अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी के सदस्य के रूप में विधानसभा चुनाव में कदम रखा। उन्होंने 23764 मतों के अंतर से जीत दर्ज की और यह साबित किया कि वे अपने दादा किशोरी लाल साह और पिता हरिशंकर प्रसाद की राजनीतिक विरासत को बखूबी आगे बढ़ा सकते हैं। उसी वर्ष नवंबर 2005 में हुए पुनः चुनाव में भी भाजपा ने पिंटू पर भरोसा जताया। इस बार उन्होंने कांग्रेस के खलील अंसारी को 21253 वोटों के अंतर से हराकर लगातार दूसरी जीत हासिल की।
इसके बाद 2010 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने लोजपा के राघवेन्द्र कुमार कुशवाहा को 5221 मतों से हराकर जीत की हैट्रिक पूरी की। पिंटू का राजनीतिक ग्राफ लगातार ऊपर जाता रहा, और वे 2010 से 2013 तक बिहार सरकार में पर्यटन मंत्री भी रहे। हालांकि, 2015 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, जब राजद प्रत्याशी सुनील कुमार ने उन्हें पराजित किया। इसके बावजूद, पिंटू ने 2019 में फिर से वापसी की और जदयू के टिकट पर सीतामढ़ी से लोकसभा सांसद निर्वाचित हुए। उसी चुनाव में, सीतामढ़ी लोकसभा क्षेत्र से सीपीआई ने पहली बार उम्मीदवार उतारा। इस चुनाव में पिंटू को 14601 वोट और सीपीआई उम्मीदवार को 13609 वोट प्राप्त हुए।
2015 में सीतामढ़ी विधानसभा सीट पर पुरुष वोटर रहे आगे
वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में सीतामढ़ी जिले के आठ विधानसभा क्षेत्रों में से केवल सीतामढ़ी विस क्षेत्र ऐसा था, जहां पुरुष मतदाता महिला मतदाताओं से आगे रहे। जबकि बाकी सात विधानसभा क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया था। सीतामढ़ी सीट पर उस वर्ष कुल 84,005 पुरुष मतदाताओं ने मतदान किया, जबकि महिला वोटरों की संख्या 79,487 रही। यह आंकड़ा बताता है कि जहां अधिकांश क्षेत्रों में महिला वोटिंग प्रतिशत बढ़ा, वहीं सीतामढ़ी विस क्षेत्र में पुरुष वोटरों की भागीदारी थोड़ी अधिक रही।
सीतामढ़ी विधानसभा चुनाव 2015 : जानें किसे कितने वोट मिले?
वर्ष 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में सीतामढ़ी सीट पर कुल 16 प्रत्याशी मैदान में थे, जिनमें से 2 महिलाएं भी थीं। यह चुनाव कई मायनों में रोचक रहा, खासकर दो प्रत्याशियों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला। राजद प्रत्याशी सुनील कुमार को सबसे अधिक 81,557 वोट मिले और वे विजयी हुए। भाजपा के सुनील कुमार उर्फ पिंटू को 66,835 वोट प्राप्त हुए और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। तीसरे स्थान पर रहीं निर्दलीय प्रत्याशी नगीना देवी, जिन्हें 3,624 वोट मिले। अनुप महतो को 2,236 वोट हासिल हुए। इस चुनाव में कुल 11 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी।
भोला बाबू की चुनावी यात्रा : एक बार जीत, फिर गिरावट
सीपीआई नेता भोला बाबू ने पहली बार 1969 में चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद पार्टी ने 1972 के विधानसभा चुनाव में उन पर दोबारा भरोसा जताया और उन्होंने इस बार 26528 वोटों के साथ जीत दर्ज की। वे 5989 मतों के अंतर से विजयी हुए। हालांकि, इसके बाद उनका राजनीतिक ग्राफ गिरता गया। 1977 के चुनाव में उन्होंने 7264 वोट प्राप्त किए और तीसरे स्थान पर रहे। 1980 के चुनाव में स्थिति और खराब हुई, उन्हें केवल 8918 वोट मिले और वे पांचवें स्थान पर खिसक गए। 1980 के बाद भोला बाबू ने फिर कभी चुनाव नहीं लड़ा। 1985 के चुनाव में कांग्रेस के खलील अंसारी ने 4992 मतों के अंतर से जीत दर्ज की।




