नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। अमेरिका में आज 5 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव को लेकर प्रक्रिया शुरु होने को है। मौजूदा राष्ट्रपति के समर्थन से उपराष्ट्रपति कमला हैरिस डेमोक्रेटिक्स की तरफ से चुनावी ताल ठोक रही हैं जबकि रिपब्लिकन पार्टी के ओर से पूर्व राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप मैदान में उतरे हुए हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अमेरिका मे राष्ट्रपति चुने जाने की प्रक्रिया भारत से कितनी अलग है। अगर नही जानते तो आपको अमेरिकी राष्ट्रपति चुने जाने के पूरे प्रोसेस से रूबरू कराएंगे।
प्राइमरी और कॉकस
यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके जरिए डेलीगेट्स का चुनाव होता है। इस प्रक्रिया के तहत रजिस्टर्ड सदस्य और चुनाव लडने के इच्छुक आम लोग प्राइमरी के जरिए वोट देते हैं। इसके बाद आम डेलीगेट्स का चुनाव करने के लिए ओपन हॉल मीटिंग होती है जिसे कॉकस कहा जाता है। इसके बाद चुने गए डेलीगेट्स एक ऐसे उम्मीदवार का चयन करते हैं जो पार्टी की तरफ से आधिकारिक उम्मीदवार होता है।
ओपन स्टेज प्रेजिडेंशियल डिबेट
इस प्रक्रिया में दोनों पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के बीच खुले मंच पर डिबेट होती है जिसे नेशनल कन्वेंशन कहा जाता है। करीब 4 राउंड चलने वाली इस डिबेट में यहां जनता दोनों उम्मीदवारों के विजन की परख करती है।
आम चुनाव
इसके बाद आम चुनाव की प्रक्रिया शुरु होती है। आम चुनाव विनर टेक्स ऑल प्रक्रिया के तहत इलेक्टर्स चुने जाते हैं। भारत से तुलना करें तो इलेक्टर्स राष्ट्रपति के चयन में ऐसे योगदान देते हैं जैसे भारत में प्रधानमंत्री बनाने में सांसद योगदान देते हैं। जिस राज्य में जितनी जनसंख्या होती है वहां से उतने ही अधिक इलेक्टर्स चुनकर आते हैं।
इलेक्टोरल कॉलेज
चुने गए इलेक्टर्स ही डायरेक्ट राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को वोट देने के लिए अधिकृत होते हैं। इलेक्टोरल कॉलेज की प्रक्रिया दिसंबर में होती है। प्राप्त वोटों की गिनती जनवरी में की जाती है जो अमेरिकी कांग्रेस करती है। जिस प्रकार भारत में वोटों की गिनती चुनाव आयोग करता है वैसै ही अमेरिका में यह गिनती अमेरिकी कांग्रेस करती है। जिसे ज्यादा वोट मिलते हैं उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति का शपथग्रहण 20 जनवरी को होता है।





