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क्या उपनिवेशवाद सचमुच हम से दूर हो गया है?

बीजिंग, 20 फरवरी (आईएएनएस)। हर वर्ष 21 फरवरी को उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष दिवस मनाया जाता है। इस दिवस की स्थापना का लक्ष्य ऐतिहासिक सबक लेकर औपनिवेशिक शासन के काले दिनों की गलतियों को न दोहराना है। हालांकि देखने में उपनिवेशवाद इतिहास का एक हिस्सा बन गया है, लेकिन क्या वह सचमुच हम से दूर हो गया है? शायद नहीं। वास्तव में उपनिवेशवाद की विरासत खत्म नहीं हुई। उदाहरण के लिए, अफ्रीकी महाद्वीप में कई देश ऐसी स्थिति में हैं। फ्रेंच उपनिवेशवादियों ने अपनी इच्छा से अफ्ऱीकी देशों का सीमांकन किया, जिससे उन देशों के बीच संघर्ष पैदा हुआ और आपस में लड़ाई भी हुई। उन के अलावा आधुनिक काल व वर्तमान में देशों के बीच क्षेत्रीय विवाद, संसाधन विवाद, जातीय संघर्षों और धार्मिक संघर्षों के पीछे उपनिवेशवाद की विरासत भी छिपी हुई है। वास्तव में उपनिवेशवाद हमसे दूर नहीं हुआ। वह केवल एक नये रुप में दुनिया के सामने आता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, उपनिवेशों और अर्ध-उपनिवेशों में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो गया, और बड़ी संख्या में एशियाई और अफ्रीकी देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त की। पहले की एकमुश्त हिंसा और सत्ता का उपनिवेशवाद काम नहीं कर सकेगा। नतीजतन, पश्चिमी विकसित देशों ने राजनीतिक रूप से स्वतंत्र देशों को अपने नियंत्रण में लाने के लिए नव-औपनिवेशिक आक्रमण के अधिक सूक्ष्म साधनों को अपनाया है, ताकि ये देश अपने कमोडिटी बाजारों, कच्चे माल की उत्पत्ति और निवेश स्थलों के रूप में काम करना जारी रख सकें। यह नव-उपनिवेशवाद स्थानीय समाज के सभी क्षेत्रों में व्याप्त है। राजनीतिक पक्ष में, पश्चिमी विकसित देश एक ओर उपनिवेशों और अर्ध-उपनिवेशों की स्वतंत्रता की अनुमति देते हैं और मान्यता देते हैं, और दूसरी ओर एजेंटों को बढ़ावा देकर नियंत्रण करते हैं। आर्थिक पक्ष में सहायता के रूप में कठोर शर्तों के साथ ऋण संलग्न, असमान व्यापार और अन्य साधनों के माध्यम से इन देशों की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करते हैं और इन देशों को लूटते हैं। सेना के पक्ष में सैन्य सहायता प्रदान करने के रूप में इन देशों में सैन्य ठिकानों की स्थापना करने, सैनिक तैनात करने, सैन्य सलाहकार भेजने, सैनिकों की ट्रेनिंग में मदद देने आदि तरीकों से प्रच्छन्न सैन्य कब्जा करते हैं। और सांस्कृतिक पक्ष में वे तथाकथित लोकतंत्र, मुक्ति और मानव अधिकारों की अवधारणा का प्रसार-प्रचार करते हैं, कुछ देशों में जनमत बनाते हैं, अपना प्रवक्ता विकसित करते हैं, और रंग क्रांति लाने का अवसर ढूंढ़ते हैं। इसलिये नव-उपनिवेशवाद सचमुच हम से दूर नहीं है। और इस के जाल में न फंसने के लिए हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए। (चंद्रिमा -चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) –आईएएनएस आरजेएस

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