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निर्वासित तिब्बती सरकार ने चीन द्वारा तिब्बत की कथित मुक्ति की 70वीं वर्षगांठ मनाने पर जताया विरोध

धर्मशाला, 23 मई (हि.स.)। धर्मशाला स्थित निर्वासित तिब्बती सरकार ने चीन की सरकार द्वारा 23 मई को तिब्बत की कथित शांतिपूर्ण मुक्ति की 70वीं वर्षगांठ को लेकर मनाए गए समारोह का पूरी तरह से विरोध किया है। निर्वासित तिब्बती सरकार का मानना है कि चीन द्वारा मनाई जा रही यह वर्षगांठ तिब्बती लोगों के लिए त्रासदी के दिन के रूप में याद की जाती है। धर्मशाला से जारी एक संदेश में निर्वासित तिब्बती सरकार का कहना है कि तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति के झूठे दावे के साथ चीन की सरकार ने 1951 में तिब्बती पक्ष पर तथाकथित 17 सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए तिब्बती पक्ष पर भारी दबाव डाला था, ऐसे में इस एग्रीमेंट को लेकर समारोह का आयोजन करना कतई मंजूर नही है। तिब्बत के इतिहास में इस गंभीर अवसर को चिह्नित करने के लिए चीन की सरकार समारोह आयोजित कर रही है जिसे किसी भी रूप में मान्यता नही मिलनी चाहिए। निर्वासित तिब्बती सरकार के मुताबिक वर्ष 1949 में कम्युनिस्ट चीन की सेना केे देश पर सशस्त्र आक्रमण शुरू करने तक तिब्बत की वास्तविक स्थिति बनी रही। 1950 में तिब्बत की स्थिति अत्यधिक गंभीर हो गई। एक स्वतंत्र देश के रूप में इसकी स्थिति के साथ गंभीर खतरा था कि भले ही 14वें दलाई लामा केवल 16 वर्ष के थे तथा उन्हें अस्थायी प्रमुख होने के साथ ही देश के आध्यात्मिक नेता की दोहरी भूमिका निभानी पड़ी। साम्यवादी चीनी सरकार ने 1951 में तथाकथित 17-सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए हिंसा की धमकियों के साथ तिब्बतियों को मजबूर किया। चीनी कब्जे वाले तिब्बत में चीनी अधिकारियों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के स्तर की तलाश करने का प्रयास किया गया लेकिन कम्युनिस्ट चीनी सरकार ने उस समझौते के हर प्रावधान की अनदेखी की। तिब्बती लोगों को केवल एक हिंसक दमन के साथ दबाया गया था। इस स्थिति ने दलाई लामा को अपने मंत्रिमंडल के साथ ल्हासा छोड़ने के लिए तिब्बत के सीमावर्ती जिले लुंटसे में तिब्बत की सरकार संचालित करने के लिए मजबूर किया। वहीं बाद में तिब्बत में खराब होते हालात के चलते निर्वासन में पहुंचे परम पावन दलाई लामा ने 18 अप्रैल 1959 को भारत में असम राज्य के तेजपुर शहर में तथाकथित समझौते को न मानने की घोषणा की थी। निर्वासित तिब्बती सरकार का मानना है कि चीनी सरकार के नेता अभी भी उस दस्तावेज को एक समझौते का नाम देते हैं। उस तथाकथित समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भी चीनी सरकार की सेना ने तिब्बत में सैनिकों को नियंत्रण करने के लिए भेजा। इस प्रक्रिया में लाखों तिब्बती लोग मारे गए थे और तिब्बती लोगों को क्रूरता की सीमा से परे कारावास, पिटाई और यातनाएं दी गई थी। तिब्बत की स्थिति आज भी अत्यंत हृदय विदारक बनी हुई है। इसलिए, वास्तविक स्थिति यह बनी हुई है कि यह एक शांतिपूर्ण मुक्ति नहीं थी बल्कि एक हिंसक सशस्त्र आक्रमण और कब्जा था जो तिब्बत में चीनी सरकार द्वारा किया गया था। निर्वासित तिब्बती सरकार ने चीन के इस कदम का विरोध करते हुए विश्व भर के विभिन्न देशों की सरकारों से आग्रह किया है कि जो देश तिब्बती लोगों के संघर्ष का समर्थन करते हैं, वह इस वर्षगांठ को कोई मान्यता न दें। हिन्दुस्थान समाचार/सतेंद्र/सुनील

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