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Monday, March 2, 2026
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पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के LPG मॉडल ने बदल दी थी देश की तस्‍वीर, आर्थिक मंदी से जूझ रहा था भारत

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे है। उनका गुरुवार रात निधन हो गया। वे साल 2004 से 2014 तक देश के प्रधानमंत्री रहे। इससे पहले वह देश के वित्त मंत्री भी रह चुके थे।

नई दिल्ली, रफ्तार डेस्‍क । देश के पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता मनमोहन सिंह का निधन हो गया। 92 साल की उम्र में गुरुवार रात को दिल्ली के एम्स में अंतिम सांस ली। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। मनमोहन सिंह साल 2004 से 2014 तक दो बार देश के PM रहे। मनमोहन सिंह को भारत में आर्थिक सुधार का सूत्रधार माना जाता है। पीवी नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री रह चुके थे और रिजर्व बैंक के गवर्नर भी रह चुके थे। इस बीच देश उदारीकरण और आर्थिक स्थिति से कमजोर था, देश में भारी मंदी का तौर था, उस दौरान उन्होंने देश में LPG मॉडल लागू किया। LPG मॉडल के जरिए विदेशी कंपनियों को देश में निवेश और कारोबार करने की परमिशन दी गई थी। साथ ही देश की अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा मिली। 

विदेशी कंपनियों को कारोबार करने की मिली इजाजत 

90 के दशक में पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे। राव सरकार में मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री चुने गए थे। उस दौरान देश अर्थव्यवस्था में काफी कमजोर था। भारत के पास विदेशी मुद्रा का भंडार मात्र 5.80 अरब डॉलर था। इससे मात्र 15 दिनों का ही आयात किया जाना संभव था। इस बीच अगर 15 दिनों बाद भारत को अगर अन्‍य वस्‍तु या चीजों जैसे दवाई, पेट्रोलियम आदि की आवश्‍यकता पड़ती तो उसे खरीदा नही जा सकता था। इस स्थिति से निपटने के लिए भारत ने IMF और यूरोपीय देशों से लोन की मांग की।

हालांकि इस दौरान एक पेंच फंस गया, वो यह है कि IMF ने एक अजीब शर्त रख दी। वह यह कि भारत को लोन तभी मिलेगा जब वह अपने देश में विदेशी कंपनियों को कारोबार करने की इजाजत देगा। इसी के साथ कुछ शर्त यूरोपीय देशों ने भी रख दी। उन्‍होंने कहा कि, भारत में न केवल विदेशी कंपनियां काम करेगी बल्कि प्राइवेट और सरकारी कंपनियां भी चलेंगी। इस मुद्दे को लेकर सरकार में विचार-विमर्श हुआ और अंत में इसे परमिशन दी गई। इससे भारत में विदेशी कंपनियां अपना निवेश करने को राजी हो गई और भारत को लोन के जरिए आर्थिक सहयोग मिल गया। 

LPG मॉडल ने देश को दी नई उंचाई 

90 के दशक में मनमोहन सिंह देश के वित्‍त मंत्री थे और भारत सरकार के नेतृत्व में LPG (Liberalization, Privatization और Globalization) मॉडल लॉन्‍च किया गया। इस मॉडल के माध्‍यम से केंद्र सरकार ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। इससे विदेशी कंपनियों के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों को भी भारत में काम करने का मौका मिल गया।

क्या है LPG का मतलब?

उदारीकरण (Liberalization): उदारीकरण को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने कारोबार के नियमों को उदार बनाया। कारोबार में सरकारी हस्तक्षेप को ना के बराबर किया और मार्केट सिस्टम पर निर्भरता को बढ़ाया दिया। उदारीकरण के बाद कारोबार की गतिविधियों को सरकार न तय करके उसकी जगह बाजार तय करने लगा।

निजीकरण (Privatization): देश में निजीकरण का फॅार्मूला लागू कर सार्वजनिक स्वामित्व की कंपनियों में सरकार की भागीदारी को कम किया गया और यह धीरे-धीरे सामान्‍य कडीशन में आने लगा। सरकारी कंपनियों का हिस्सा प्राइवेट कंपनियों के हाथों में सौंपा जाने लगा। इस कारण आज भी ऐसी कई खबरें आती हैं जिनमें पता चलता है कि सरकार ने सरकारी कंपनियों को प्राइवेट कंपनियों के हाथों सौंपा जा रहा है। 

वैश्वीकरण (Globalization): भारत की अर्थव्यवस्था दयनीय स्थिति में आ खड़ी थी। इस दौरान विदेशी कंपनियों को भारत में कारोबार करने का न्‍योता दिया गया, और कई कंपनियों के रास्ते भारत में खोल दिए गए। अर्थव्यवस्थाओं की दूरी को खत्म कर दी गई। वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए देश से दूसरे देश में आर्यात-निर्यात की प्रक्रिया में आने वाली बाधाओं को भी दूर कर खत्‍म कर दिया गया।

बैंकों का विस्तारीकरण

उदारीकरण के बाद देश में कई बदलाव किए गए। साल 1991 में वैश्विकरण का दौर था। तत्कालीन सरकार ने कस्टम ड्यूटी को 220% से घटाकर 150% किया। बैंकों पर RBI की लगाम को कम कर दिया था। इससे बैंकों को जमा और कर्ज पर ब्याज दर और कर्ज की रकम तय करने का अधिकार मिल गया। इसके अलावा नए प्राइवेट बैंक खोलने पर जोर दिया गया और इसके साथ बैंकों के नियम को और आसान कर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि देश में बैंकों का विस्तार होने लगा।

लाइसेंस राज खत्म हुआ

मनमोहन सिंह के एलपीजी मॉडल लाने से उदारीकरण, निजीकरण और वैश्विकरण को बढ़ावा मिला। इसके बाद भारत सरकार ने कई नियमों में बदलाव किए। इस बदलाव का सबसे बड़ा फैसला यह था कि देश में लाइसेंस राज को पूरी तरह समाप्‍त करना था। सरकार ने बीच कई निर्णय भारतीय बाजार पर छोड़ दिए। इनमें किस चीज का कितना प्रोडक्शन होगा और उसकी कितनी कीमत होगी जैसे फैसले भी शामिल थे। उस समय सरकार ने करीब 18 इंडस्ट्रीज को छोड़कर लगभग सभी के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता को खत्म कर दिया था।

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