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Chaitra Ashtami के दिन इस विधि से करें पूजा अर्चना, मता दुर्गा की होगी आप पर कृपा

Chaitra Ashtami पर जानिए कैसे करें माता दुर्गा की अर्चना, अपनाएं ये आसान पूजा विधि, माता रानी की होगी कृपा से दूर होंगी सभी परेशानियां।

नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri) का पावन पर्व पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। हिन्दू धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व माना गया है, जिसमें देवी मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। 9 दिनों में माता स्वयं पृथ्वी पर विराजमान होकर अपने भक्तों को सुख-समृद्धि और आशीर्वाद प्रदान करती हैं। इसके साथ ही नवरात्रि की अष्टमी का भी काफी मान्यता है। इस तिथि पर देवी मां महागौरी की उपासना विशेष फलदायी होती है।

चैत्र अष्टमी के दिन

इस दिन भक्तों को विधिपूर्वक पूजन कर माता को नारियल, सफेद मिठाई और हलवा-पूरी का भोग लगाना चाहिए।ऐसा करने से जीवन में सुख-शांति, वैवाहिक सुख और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

पूजा विधि औरविशेष महत्व

चैत्र अष्टमी को हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ माना जाता है। यह दिन मां दुर्गा के विशेष रूपों की पूजा और अर्चना का होता है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। आज घर को साफ-सुथरा करके पूजा की तैयारी करनी चाहिए। सबसे पहले स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनें। पूजा स्थान पर माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें और उन्हें सफेद या लाल फूलों से सजाएं। इसके बाद दीपक जलाएं और धूप-दीब की सुगंधित खुशबू से वातावरण को पवित्र बनाएं।

चैत्र अष्टमी की पूजा केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का माध्यम भी है। इस दिन माता दुर्गा की अर्चना करने से मन और आत्मा दोनों को शक्ति मिलती है।

अष्टमी के दिन करें आरती

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोऊ नैना, चंद्रवदन नीको॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे।
रक्त पुष्प गल माला, कंठन पर साजे॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनि जन सेवत, तिनके दुखहारी॥

कानन कुंडल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥

शुंभ निशुंभ विदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥

चंड-मुंड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोऊ मारे, सुर भयहीन करे॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥

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