नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । हिंदू धर्म में पितृपक्ष पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और पूजन का पावन समय माना जाता है। यह पक्ष हर वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन अमावस्या तक चलती है, जब श्रद्धालु अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
वर्ष 2025 में पितृपक्ष की शुरुआत आज 7 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा से होगी। इस दिन पूर्णिमा श्राद्ध किया जाएगा और खासतौर पर मातृपक्ष यानी नाना-नानी सहित अन्य का तर्पण कर पूर्वजों को श्रद्धांजलि दी जाएगी।
पितृपक्ष का विधिवत आरंभ 8 सितंबर से होगा, जब आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर प्रतिपदा श्राद्ध किया जाएगा। यह पावन काल 21 सितंबर तक चलेगा और आश्विन अमावस्या को पितृ विसर्जन के साथ समाप्त होगा।
22 सितंबर से शारदीय नवरात्र का शुभारंभ होगा, जो मां आदिशक्ति की आराधना का महापर्व है। इसी दिन महालय का विशेष महत्व रहता है, जिसकी गणना भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक की जाती है।
पंचमी और षष्ठी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन
पितृपक्ष 2025 में तिथि व्यवस्था के अनुसार पंचमी और षष्ठी श्राद्ध एक ही दिन होंगे। 12 सितंबर को दोपहर 1:20 बजे तक पंचमी तिथि रहेगी, जिसके बाद षष्ठी प्रारंभ होगी, जबकि 13 सितंबर को सुबह 11:04 बजे तक ही षष्ठी तिथि मान्य रहेगी।
शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध और तर्पण का श्रेष्ठ समय दोपहर 12 से 2 बजे तक माना गया है। इसी कारण पंचमी और षष्ठी का श्राद्ध 12 सितंबर को ही होगा, जब दोनों तिथियां इस अवधि में उपलब्ध रहेंगी। यह विशेष संयोग पितृपक्ष में तिथियों के सटीक पालन का महत्व दर्शाता है।
चंद्रग्रहण और श्राद्ध तिथि का संयोग
पितृपक्ष 2025 की शुरुआत इस बार एक विशेष खगोलीय संयोग के साथ होगी। भाद्रपद पूर्णिमा की तिथि 6 सितंबर की आधी रात 12:57 बजे से प्रारंभ होकर आज 7 सितंबर की रात 11:47 बजे तक रहेगी, जिसके साथ श्राद्ध पक्ष का शुभारंभ माना जाएगा।
इसी दिन यानी, आज 7 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध संपन्न होगा, जिसमें विशेष रूप से मातृपक्ष यानी नाना-नानी आदि का तर्पण किया जाएगा। इसी रात खग्रास चंद्रग्रहण भी लगेगा, जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में दिखाई देगा, जिससे पितृपक्ष का आरंभ और भी विशेष बन जाएगा।
यह ग्रहण रात 9:52 बजे से शुरू होकर 1:27 बजे तक चलेगा। चंद्रग्रहण के समाप्त होते ही आश्विन कृष्ण प्रतिपदा तिथि आरंभ हो जाएगी। इसलिए प्रतिपदा का श्राद्ध अगले दिन, यानी 8 सितंबर 2025 को संपन्न होगा। यह संयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि ग्रहण काल में धार्मिक कार्यों और तर्पण का विशेष महत्व होता है, और इसके बाद पितृपक्ष का औपचारिक शुभारंभ माना जाएगा।
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