नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। पितृ पक्ष की शुरुआत हो चुकी है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से आश्विन अमावस्या तक की अवधि को पितृ पक्ष कहा जाता है। यह पूरा 16 दिन चलने वाला पितृ पक्ष होता है। इस दौरान पितरों के लिए पिंडदान अथवा श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा तृप्त हो जाती है। मान्यता है कि पितर पक्ष में यमराज भी पितरों की आत्मा को बंधन मुक्त कर देते हैं ताकि वे पृथ्वी पर आ कर अपने घर परिवार के लोगों को आशीर्वाद दे सकें। और अन्य जल ग्रहण कर सकें। वहीं, कुछ लोग पिंडदान गया जा कर करते हैं। तो आइए जानते हैं कि गया में पिंडदान का महत्व क्या है?
राम भगवान ने भी गया में किया था पिंडदान
पितृ पक्ष का समय श्राद्ध कर्म और पिंडदान का काफी महत्व होता है। कुछ लोग इसको घर पर करते हैं कुछ नदी के किनारे कुछ लोग इसको करने के लिए बिहार के गया जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार गया में श्राद्ध कर्म, तर्पण विधि और पिंडदान करने के बाद कुछ भी शेष नहीं रह जाता है और यहां से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है। आप को बता दें कि, फल्गु नदी के तट पर भगवान राम और माता सीता ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए यहीं पर श्राद्ध कर्म और पिंडदान किया था। इसके बाद जो जातक यहां आकर श्राद्ध कर्म और पिंडदान करता है उसे पितृ दोष से छुटकारा मिल जाता हैं। साथ ही उनके पूर्वजों को भी मुक्ति मिलती है।
गया में पिंडदान करने से पूवजों को मिलती हैं पूर्ण मुक्ति
गया शहर का नाम वायु पुराण, गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में भी बताया गया हैं। इस शहर को मोक्ष की भूमि अर्थात मोक्ष स्थली भी कहा जाता है। शास्त्रों में इस बार का भी ज्रिक किया गया कि महाभारत काल में पांडवों ने भी इसी स्थान पर श्राद्ध कर्म किया था। पितृ पक्ष के दौरान गया में मेला लगता हैं जिसे पितृपक्ष का मेला भी कहा जाता है।इसीलिए जातक अपने पूवजों को सम्पूर्ण मुक्ति दिलाने के लिए गया शहर का रूख करते हैं।
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