नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, जो भगवान विष्णु को समर्पित होता है। हर माह दो बार आने वाली यह तिथि अलग-अलग नाम और फल प्रदान करती है। पहली बार व्रत आरंभ करने से पहले शुभ दिन का चयन आवश्यक माना गया है। जानिए, एकादशी उपवास कब और कैसे प्रारंभ करें।
एकादशी व्रत कब से शुरू करना चाहिए?
पहली बार एकादशी व्रत आरंभ करने के लिए मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। मान्यता है कि इसी दिन एकादशी माता का प्राकट्य हुआ था। यद्यपि कोई भी एकादशी व्रत आरंभ किया जा सकता है, परंतु उत्पन्ना एकादशी से शुरुआत अत्यंत शुभ मानी जाती है।
उत्पन्ना एकादशी 2025 कब है?
पहली बार एकादशी व्रत रखने के लिए मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी को सबसे शुभ माना गया है। पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन एकादशी देवी का प्राकट्य हुआ था। हालांकि किसी भी एकादशी से व्रत आरंभ किया जा सकता है, पर उत्पन्ना एकादशी से शुरुआत श्रेष्ठ मानी जाती है।
एकादशी व्रत किसको करना चाहिए?
एकादशी व्रत सार्वभौमिक है, जिसे कोई भी व्यक्ति रख सकता है। भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति के लिए विवाहित, अविवाहित, पुरुष, महिलाएं, बच्चे या विधवाएं सभी इस व्रत का पालन कर सकते हैं। यह व्रत मन को पवित्र करता है और जीवन में शुभ फल प्रदान करता है।
एकादशी व्रत कितने करने चाहिए?
एकादशी व्रत वर्ष में लगभग 24 से 26 बार आता है, जिसमें हर महीने दो एकादशियां होती हैं। धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत कम से कम 5 से 11 वर्ष तक करना शुभ होता है। श्रद्धा और सामर्थ्य हो तो जीवनभर व्रत रखा जा सकता है, अन्यथा एक वर्ष बाद उद्यापन करना उचित माना गया है।
एकादशी व्रत के फायदे
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत पापों का नाश करने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। इस व्रत से घर में सुख-समृद्धि, धन-धान्य की वृद्धि और जीवन में खुशहाली आती है। भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की कृपा से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
पहली बार एकादशी व्रत कैसे शुरू करें?
दशमी की तैयारी: दशमी की शाम से ही सात्त्विक भोजन करें और रात में भोजन न करें।
पवित्रता: प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
संकल्प: जल और पुष्प लेकर भगवान विष्णु से व्रत पूर्ण करने की शक्ति मांगें।
निश्चय: तय करें कि आप हर महीने एक या दोनों एकादशी रखेंगे।
पूजा: दीप प्रज्वलित कर गंगाजल से भगवान विष्णु का अभिषेक करें, पुष्प व तुलसी दल अर्पित करें।
भोजन नियम: फल, दूध, दही, छाछ, साबूदाना, कुट्टू आटा आदि खा सकते हैं; प्याज, लहसुन, अनाज और दालों से परहेज करें।
सात्त्विक भोग: भोग में केवल सात्त्विक चीजें प्रयोग करें, तुलसी अवश्य शामिल करें।
नियम: एकादशी पर झाड़ू न लगाएं, बाल और नाखून न कटवाएं।
पारण: द्वादशी को जरूरतमंद या ब्राह्मण को भोजन-दान दें, फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें।
तुलसी पारण: गंगाजल व तुलसी पत्र से पारण करना शुभ होता है।
ध्यान रखें: भोजन का पहला निवाला गाय, पक्षियों या घर के सदस्यों को अवश्य दें।




