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Wednesday, March 11, 2026
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फतुहा सीट: ‘C फैक्टर’ का गढ़, क्या चौथी बार जीत की हैट्रिक पूरी करेंगे राजद के डॉ. रामानंद यादव?

पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाली फतुहा विधानसभा सीट ने 18 चुनावी जंगें देखीं जहां 2.71 लाख मतदाताओं में एससी वोटरों की निर्णायक भूमिका अहम माना जाता है।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली फतुहा विधानसभा सीट बिहार की उन चुनिंदा सीटों में शुमार है, जहां जातीय समीकरण ही चुनावी भाग्य तय करते हैं। 1957 में अस्तित्व में आने के बाद से यह सीट 18 बार विधानसभा चुनाव की जंग देख चुकी है और हर बार समीकरण नए सिरे से लिखे गए हैं। यह इलाका न केवल अपनी सांस्कृतिक विरासत और औद्योगिक पहचान के लिए मशहूर है, बल्कि यहां की सियासत में जातीय C फैक्टर (Caste/Community) की पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है।

एससी वोटर बने हैं निर्णायक शक्ति

2020 के मतदाता आंकड़ों के मुताबिक, फतुहा के कुल 2,71,238 मतदाताओं में अनुसूचित जाति (SC) वोटरों की हिस्सेदारी लगभग 18.6% है। यह वोट बैंक हर चुनाव में तय करता है कि फतुहा की सत्ता की चाबी किसके हाथ जाएगी।

रामानंद यादव का ‘अभेद्य किला’

पिछले डेढ़ दशक से फतुहा की राजनीति डॉ. रामानंद यादव (राजद) के इर्द-गिर्द घूमती रही है।

2010 में पहली बार विधानसभा पहुंचने के बाद से यादव ने इस सीट को राजद का मजबूत गढ़ बना दिया।

2010 में पहली बार विजय।

2015 में लोजपा प्रत्याशी सत्येंद्र कुमार सिंह को 30,402 वोटों के भारी अंतर से हराया।

साल 2020 में भाजपा उम्मीदवार सत्येंद्र सिंह पर 19,370 वोटों की जीत दर्ज की

अब डॉ. यादव लगातार चौथी बार जीत का दावा कर रहे हैं, जबकि एनडीए गठबंधन उनके विजय रथ को रोकने की पूरी तैयारी में है।

इस बार की टक्कर: रामानंद बनाम रूपा कुमारी

आगामी चुनाव में राजद प्रत्याशी डॉ. रामानंद यादव का मुकाबला लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की उम्मीदवार रूपा कुमारी से माना जा रहा है।राजनीतिक पंडितों का कहना है कि मुकाबला भले ही सीधा दिख रहा हो, लेकिन जातीय समीकरण और बूथ प्रबंधन इस बार भी परिणामों की दिशा तय करेंगे।

फतुहा: आस्था, इतिहास और उद्योग का संगम

फतुहा की पहचान सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि धार्मिक और औद्योगिक रूप से भी अहम है। यह स्थान हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख और मुस्लिम – सभी धर्मों के लिए पूज्यनीय है। कहा जाता है कि भगवान राम और भगवान कृष्ण दोनों ही इस पवित्र स्थल से होकर गुजरे थे। यहां संत कबीर का मठ और कच्ची दरगाह जैसी ऐतिहासिक धरोहरें धार्मिक एकता की मिसाल पेश करती हैं।

औद्योगिक दृष्टि से फतुहा का नाम पारंपरिक पटवा समुदाय से जुड़ा है जो वस्त्र निर्माण में निपुण रहा है। आज यहां ट्रैक्टर निर्माण इकाई, एलपीजी बॉटलिंग प्लांट और औद्योगिक क्लस्टर बिहार के औद्योगिक पुनरुद्धार की नई पहचान बन रहे हैं।फतुहा की राजनीति में ‘C फैक्टर’ यानी जातीय समीकरण आज भी सबसे मजबूत तत्व है।सवाल अब यही है क्या डॉ. रामानंद यादव चौथी बार अपनी जीत की परंपरा कायम रख पाएंगे,या एनडीए गठबंधन इस बार राजद का किला भेदने में सफल होगा। अब ये जवाब तो जनता के जनादेश में ही छिपा है। 

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