नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। बिहार में इस समय स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण चल रहा है। लेकिन इसकी प्रक्रिया पर अब सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठे हैं। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को जल्दबाज़ी में, मनमाने ढंग से और बिना पारदर्शिता के चला रहा है।
याचिकाकर्ताओं की आपत्तियाँ क्या हैं?
1. प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी
याचिकाकर्ता के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि आयोग ने एक नया शब्द गढ़ लिया है – स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन। इसमें पार्दशिता की कमी है। यह प्रक्रिया तेज़ी से चलाई जा रही है जबकि बिहार में 7.5 करोड़ से अधिक मतदाता हैं।
2. आधार और वोटर ID को क्यों नहीं माना जा रहा?
उन्होंने सवाल उठाया कि जब आधार और वोटर कार्ड को पहचान पत्र के रूप में देशभर में स्वीकार किया जाता है, तो इस प्रक्रिया में क्यों नहीं?
3. घर-घर जाकर सत्यापन क्यों नहीं?
यदि यह ‘गहन पुनरीक्षण’ है, तो अधिकारियों को हर घर जाकर वोटर की पुष्टि करनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा।
4. 2003 की लिस्ट को मान्यता, नई एंट्री के लिए कड़े नियम
जो लोग 2003 की वोटर लिस्ट में शामिल हैं, उन्हें कोई दिक्कत नहीं, लेकिन जो बाद में जुड़े हैं, उन्हें अपनी नागरिकता के दस्तावेज देने पड़ रहे हैं। यह भेदभाव है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ
जस्टिस धुलिया ने कहा कि आयोग अगर पहले से डाटा के आधार पर काम कर रहा है तो घर-घर जाकर सत्यापन अनिवार्य नहीं भी हो सकता है। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग का काम है यह सुनिश्चित करना कि कोई अयोग्य व्यक्ति वोट ना डाल सके। EC के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है, इसलिए उसे मान्यता नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि वोट देने का अधिकार सिर्फ भारतीय नागरिकों को है, इसलिए पहचान और नागरिकता की जांच जरूरी है।
कपिल सिब्बल का बड़ा सवाल
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा, “भारत का नागरिक कौन है, यह तय करने का अधिकार चुनाव आयोग को किसने दिया? इस पर कोर्ट ने जवाब दिया – “क्या चुनाव आयोग का कर्तव्य नहीं कि यह देखे कि वोट कोई अयोग्य व्यक्ति ना डाले?” सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है, लेकिन यह साफ कर दिया है कि चुनाव आयोग को साबित करना होगा कि प्रक्रिया संवैधानिक और व्यावहारिक है। याचिकाकर्ताओं को भी यह साबित करना होगा कि आयोग की प्रक्रिया गैर-कानूनी या भेदभावपूर्ण है। बिहार की मतदाता सूची पर देश की सबसे बड़ी अदालत में बहस जारी है। एक तरफ आयोग इसे संवैधानिक जिम्मेदारी बता रहा है, वहीं याचिकाकर्ता इसके तरीकों पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। अब देखना होगा कि अदालत किसे सही मानती है।




