नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । बिहार में विधानसभा चुनाव होने में बस कुछ महीने ही बचें है। चुनाव आयोग इसके लिए जल्द ही तारीखों का ऐलान कर सकता है। आयोग अपने स्तर पर तैयारियों में लगा है। तो वही, राजनीति पार्टियां भी सक्रिय हो गई है। राज्य में सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। एक-दूसरे पर सियासी दलों का आरोप-प्रत्यारोप जारी है।
बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी JDU ओर पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव की पार्टी RJD का दबदबा है। यहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) तीसरे पायदान पर आती है। लेकिन बीजेपी JDU के जरिए राज्य में अपनी मजबूत पकड़ बनाने में लगी हुई। हालांकि, जेडीयू एनडीए का हिस्सा है। इस बार चुनाव में एक तरफ NDA है तो एक तरफ महागठबंधन दोनों के बीच इस बार मुकाबला तगड़ा होता दिख रहा है। इसी बीच, कई क्षेत्रीय दल और पार्टियां जो इस चुनाव में किंगमेकर तो नहीं, लेकिन खेला जरुर कर सकती है।
सूबे के इस चुनाव में लालू और नीतीश के चुनावी गणित को बिगाड़ के लिए बिहार में उभर रहीं पार्टियां अहम भूमिका निभा सकती है। जिसमें प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी, असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM, बसपा, VIP, और पशुपति पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के साथ साथ NDA के घटक दल चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) जैसी पार्टयियां नीतीश कुमार (JDU) और लालू प्रसाद यादव (RJD) के नेतृत्व वाले NDA और महागठबंधन के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।
चिराग का पासवान वोटों का ध्रुवीकरण
चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) बिहार में पासवान समुदाय (लगभग 5-6% वोट) पर मजबूत पकड़ रखती है। 2020 के चुनाव में चिराग ने NDA से बगावत कर JDU की 30 से अधिक सीटों का गणित बिगड़े थे। जिससे नीतीश की सीटें 43 तक सिमट गई थीं। इस बार चिराग NDA के साथ हैं, लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा और सामान्य सीटों पर दावेदारी नीतीश के लिए चुनौती बन सकती है।
बगावत कर सकते पासवान?
हाजीपुर, वैशाली, और समस्तीपुर जैसे क्षेत्रों में चिराग का प्रभाव मजबूत है। अगर सीट बंटवारे में असंतोष हुआ, तो बागी उम्मीदवार JDU या BJP के वोटों का ध्रुवीकरण कर सकते है। चिराग युवा और दलित वोटरों को लुभाने के लिए आक्रामक प्रचार कर रहे हैं। ऐसे में अगर चिराग को NDA में कम सीटें मिलीं, तो वे गठबंधन से फिर बगावत कर सकते है, जैसा कि 2020 में हुआ था।
PK- नया विकल्प या वोट कटवा?
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी 2025 में पहली बार पूर्ण रुप से मैदान में उतरी है। PK, जो पहले नीतीश और लालू के लिए राजनीति सलाहकार रह चुके हैं, अब जातिगत समीकरणों को तोड़कर विकास और सुशासन के मुद्दे पर जोर दे रहे हैं। उनकी पार्टी युवा और शिक्षित वोटरों को लक्षित कर रही है।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट की माने तो जन सुराज का संगठनात्मक ढांचा अभी नया है, लेकिन PK की रणनीतिक समझ और सोशल मीडिया उपस्थिति उन्हें 50-60 सीटों पर प्रभावी बना सकती है। प्रशांत किशोर की पदयात्रा और जनसभाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में भी ध्यान खींचा है। वे भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को उठा रहे हैं, जो दोनों गठबंधनों के लिए खतरा बन सकता है।
AIMIM का सीमांचल में बढ़ता पकड़बिहार की सियासत में AIMIM का भी जिक्र होता है। असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद मुसलमीन (AIMIM) बिहार के सीमांचल क्षेत्र (किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया, अररिया) में वह प्रभावी है। इस क्षेत्र में उनका प्रभाव बढ़ता जा रहा है। जहां मुस्लिम आबादी 30-40% है। 2020 में AIMIM ने 5 सीटें जीती थीं, जिससे RJD के MY समीकरण के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगी थी।
AIMIM के बढ़ते प्रभाव को लेकर पॉलिटिकल एक्सपर्ट कहते है कि, यह मुस्लिम वोटों पर फोकस कर महागठबंधन को चोट पहुंचा सकते है। क्योंकि RJD-कांग्रेस गठबंधन इस वोट बैंक पर निर्भर करते हैं। सीमांचल की 24 सीटों में से कुछ पर AIMIM का प्रभाव निर्णायक हो सकता है। ओवैसी मुस्लिम युवाओं और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित प्रचार करते हैं। उनकी सभाएं सीमांचल में भारी भीड़ जुटा रही हैं।
इन पार्टियों की क्या है असली रणनीति
मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बसपा), मुकेश साहनी की पार्टी विकासशील इंसान पार्टी (VIP), और पशुपति पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी जैसे छोटे दल भी बिहार चुनाव में सक्रिय हैं। यह दल समय-समय पर अपने तेवर दिखते रहते है। यह दल दलित, EBC, और कुछ क्षेत्रीय वोट बैंक पर ध्यान दे रहे हैं।
बसपा और पशुपति पारस की रणनीति
मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (BSP) भी अपने कोर वोट बैंक पर काम कर रही रही है, यहां पर बीएसपी अपने दलित वोटों को आकर्षित करती है, लेकिन बिहार में इसका संगठन कमजोर है। फिर भी, कुछ सीटों पर यह वोट काट सकती है। वही, पशुपति पारस की पार्टी राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) का प्रभाव सीमित है, लेकिन हाजीपुर जैसे क्षेत्रों में पासवान वोटों का बंटवारा चिराग के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
VIP के मुकेश सहनी का प्रभाव
विकासशील इंसान पार्टी (VIP) मुकेश सहनी की पार्टी EBC (निषाद और मल्लाह) वोटों पर केंद्रित है। 2020 में VIP ने NDA के साथ 4 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार उनकी स्वतंत्र रणनीति दोनों गठबंधनों को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, ये तेजस्वी के साथ महागठबंधन में मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं, जिससे ये NDA के लिए वोट काट सकते हैं।
वोट बंटवारा और क्षेत्रीय गणित
छोटे-छोटे दलों का प्रभाव बिहार की 243 सीटों में से कुछ पर निर्णायक भूमिका में आ सकते है, खासकर जहां हार-जीत का अंतर कम हो। छोटे दल NDA और महागठबंधन के कोर वोटरों (दलित, EBC, मुस्लिम, युवा) को विभाजित कर सकते हैं। 2020 में 1-2% वोट बंटवारे ने कई सीटों पर नतीजे बदले थे।
सीमांचल (AIMIM), मिथिलांचल (जन सुराज), और मगध (LJP, बसपा) जैसे क्षेत्रों में छोटे दलों का प्रभाव ज्यादा दिख सकता है। जन सुराज और चिराग की अपील युवा और शहरी वोटरों में बढ़ रही है, जो दोनों गठबंधनों के लिए खतरा है।
नीतीश और लालू की चुनौतियां और रणनीति
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि, नीतीश कुमार को चिराग और पशुपति पारस के साथ गठबंधन प्रबंधन में सावधानी बरतनी जरुरी है। उनकी EBC और महादलित वोट बैंक पर पकड़ मजबूत है, लेकिन जन सुराज और VIP इस वोट में सेंध लगा सकते हैं।
वहीं, लालू यादव की रणनीति को लेकर पॉलिटिकल एक्सपर्ट मानते है कि, RJD का MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण AIMIM और जन सुराज से प्रभावित हो सकता है। लालू को छोटे दलों को अपने पक्ष में लाने या उनके प्रभाव को कम करने की जरूरत है।




